काबुल, 6 मई (आईएएनएस)। अफगानिस्तान में हर घंटे एक मां की मौत उन जटिलताओं की वजह से हो रही है जिन्हें रोका जा सकता है, ऐसा विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने कहा है। इससे साफ होता है कि वहां की स्वास्थ्य व्यवस्था अब भी गर्भावस्था और प्रसव के दौरान महिलाओं को ठीक से सुरक्षित नहीं कर पा रही है।
‘इंटरनेशनल-डे ऑफ मिडवाइफ’ के मौके पर जारी बयान में डब्ल्यूएचओ ने बताया कि अफगानिस्तान में मातृ मृत्यु दर दुनिया में सबसे ज्यादा में से एक है। हर एक लाख जीवित जन्मों पर 521 मौतें। पिछले 20 वर्षों में बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच कुछ बेहतर हुई है, लेकिन समस्या अभी भी बड़ी है।
इनमें से कई मौतें ऐसी वजहों से होती हैं, जिनका इलाज या बचाव संभव है, जैसे ज्यादा खून बहना, हाई ब्लड प्रेशर, इंफेक्शन और प्रसव में रुकावट। जो महिलाएं इन मुश्किलों से बच भी जाती हैं, उन्हें अक्सर लंबे समय तक गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
डब्ल्यूएचओ के मुताबिक, 2000 के बाद से मातृ और शिशु स्वास्थ्य में कुछ सुधार जरूर हुआ है। गर्भावस्था के दौरान जांच (एंटीनैटल केयर) लेने वाली महिलाओं की संख्या 31 प्रतिशत से बढ़कर 76 प्रतिशत हो गई है। वहीं, प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की देखरेख में होने वाले प्रसव 24 प्रतिशत से बढ़कर 67 प्रतिशत हो गए हैं। बच्चों की मृत्यु दर भी 2000 में 1,000 जन्मों पर 129 से घटकर 2023 में 56 हो गई है। लेकिन ग्रामीण और दूर-दराज के इलाकों में रहने वाली महिलाओं के लिए खतरा अब भी ज्यादा है।
डब्ल्यूएचओ ने बताया कि एक गंभीर समस्या ‘ऑब्स्टेट्रिक फिस्टुला’ भी है, जो लंबे समय तक प्रसव में रुकावट रहने से होती है। इससे महिलाओं को कई तरह की स्वास्थ्य दिक्कतें और सामाजिक शर्मिंदगी झेलनी पड़ती है।
यह समस्या अक्सर सामने ही नहीं आ पाती क्योंकि कई महिलाओं को सही इलाज की सुविधा नहीं मिलती या उन्हें पता ही नहीं होता कि इसका इलाज संभव है। डब्ल्यूएचओ इस स्थिति को सुधारने के लिए इस्लामिक डेवलपमेंट बैंक के साथ मिलकर मातृ और शिशु स्वास्थ्य सेवाओं को बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।
इधर, यूनिसेफ ने भी चेतावनी दी है कि अगर हालात ऐसे ही रहे, तो 2030 तक अफगानिस्तान में करीब 20,000 महिला शिक्षक और 5,400 स्वास्थ्यकर्मी कम हो सकते हैं। इसका कारण लड़कियों की शिक्षा और महिलाओं के काम करने पर लगी पाबंदियां हैं।
यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2023 से 2025 के बीच सरकारी नौकरियों में महिलाओं की हिस्सेदारी 21 प्रतिशत से घटकर 17.7 प्रतिशत रह गई है।
संस्था ने कहा कि अगर स्कूलों और अस्पतालों में प्रशिक्षित महिला कर्मचारियों की संख्या कम होती रही, तो इसका बुरा असर बच्चों की पढ़ाई, स्वास्थ्य और उनके भविष्य पर पड़ेगा।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि लड़कियों और महिलाओं की शिक्षा और काम पर रोक की वजह से देश को हर साल करीब 84 मिलियन डॉलर का आर्थिक नुकसान हो रहा है, और समय के साथ यह नुकसान और बढ़ेगा।
यूनिसेफ के अनुसार, अगर महिलाओं को शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं जैसे जरूरी क्षेत्रों से हटाया गया, तो इसका सीधा असर बच्चों पर पड़ेगा। कम लड़कियां स्कूल जाएंगी और महिलाओं व बच्चों को कम स्वास्थ्य सेवाएं मिलेंगी।
खासकर स्वास्थ्य क्षेत्र में इसका असर ज्यादा गंभीर होगा, क्योंकि समाज में कई जगह महिलाएं पुरुष डॉक्टरों से इलाज कराने में सहज नहीं होतीं। ऐसे में महिला स्वास्थ्यकर्मियों की कमी से माताओं, नवजात बच्चों और बच्चों की देखभाल और भी मुश्किल हो जाएगी।

