छत्तीसगढ़ : पूर्णिमा बनीं ‘लखपति दीदी’, एसएचजी से जुड़कर बदली तकदीर

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बलरामपुर, 8 मई (आईएएनएस)। छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले की पूर्णिमा बासिन की कहानी ग्रामीण महिलाओं के लिए प्रेरणा बन चुकी है। कभी ऐसा समय था जब परिवार की रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना भी उनके लिए बड़ी चुनौती हुआ करती थी।

पूर्णिमा बासिन के पास खेत थे, मेहनत थी पर आमदनी इतनी नहीं थी कि घर आसानी से चल सके लेकिन अब तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। आज पूर्णिमा बासिन ‘लखपति दीदी’ के नाम से पहचानी जाती हैं और उनकी सफलता गांव की दूसरी महिलाओं के लिए उम्मीद की नई मिसाल बन गई है।

पूर्णिमा के जीवन में असली बदलाव तब आया जब वह स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) से जुड़ीं। समूह से जुड़ने के बाद उन्हें बैंक लिंकेज और सीआईएफ के जरिए ऋण मिला। इसी मदद ने उनके सपनों को नई दिशा दी। उन्होंने पारंपरिक खेती से आगे बढ़कर जैविक खेती अपनाने का फैसला किया और जीराफूल चावल की खेती शुरू की। यह धान की एक पारंपरिक और सुगंधित किस्म है जिसकी बाजार में अब तेजी से मांग बढ़ रही है।

पूर्णिमा ने आईएएनएस से कहा कि उन्होंने मिले हुए लोन का सही तरीके से इस्तेमाल किया। जैविक खेती शुरू करने के बाद उनकी आमदनी लगातार बढ़ती गई और आज वह लाखों रुपए की कमाई कर रही हैं। उन्होंने कहा कि इसी आय की बदौलत अब वह अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिला पा रही हैं और परिवार की आर्थिक स्थिति पहले से काफी बेहतर हो गई है। पूर्णिमा ने मुख्यमंत्री का धन्यवाद करते हुए कहा कि सरकार के सहयोग और योजनाओं की वजह से ही वह आज ‘लखपति दीदी’ बन पाई हैं।

हाल ही में पूर्णिमा की मुलाकात मुख्यमंत्री से भी हुई। इस दौरान उन्होंने अपनी संघर्ष से सफलता तक की पूरी कहानी साझा की। मुख्यमंत्री ने भी उनके प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी और आत्मनिर्भरता का मजबूत उदाहरण है।

पूर्णिमा बासिन अकेली ऐसी महिला नहीं हैं जिन्होंने अपनी मेहनत से नई पहचान बनाई हो। बलरामपुर जिले में कई महिला समूह अब आत्मनिर्भरता की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। बरियों का गांधी समूह, दुर्गापुर का संतरा समूह, और दुर्गा समूह जैसी कई महिला समितियां हस्तशिल्प और खाद्य उत्पादों के जरिए अपने कारोबार को बढ़ा रही हैं। सरकारी योजनाओं और बैंक लिंकेज की मदद से ये महिलाएं अब केवल स्थानीय बाजारों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि बड़े बाजारों तक भी अपनी पहुंच बना रही हैं।

बलरामपुर की ये कहानियां बदलते ग्रामीण भारत की तस्वीर हैं, जहां महिलाएं मेहनत, आत्मविश्वास और सही अवसर के दम पर अपनी नई पहचान बना रही हैं। खेतों से शुरू हुआ यह सफर अब सपनों को नई उड़ान दे रहा है।