कराईकल, 15 मई (आईएएनएस)। सूर्य पुत्र शनिदेव के भक्तों के लिए शनिवार का दिन खास मायने रखता है। हालांकि, ज्येष्ठ माह की अमावस्या तिथि और भी खास हो जाती है क्योंकि इस दिन शनि जन्मोत्सव मनाया जाता है। ऐसे में 16 मई (शनि जन्मोत्सव) को लेकर भक्तों में खासा उत्साह देखा जा रहा है। देश भर में शनिदेव के कई दिव्य धाम हैं, जहां दर्शन-पूजन से उनकी कृपा प्राप्त होती है। ऐसा ही एक दिव्य धाम पुडुचेरी के कराईकल जिले में स्थित है, जहां राजा नल को शनि के श्राप से मुक्ति मिली थी।
भारत सरकार के अतुल्य भारत पोर्टल पर मंदिर के बारे में विस्तार से जानकारी मिलती है। तिरुनाल्लर पुडुचेरी केंद्र शासित प्रदेश के कराईकल जिले में स्थित एक पवित्र गांव है। यहां का श्री धरबरन्येश्वर स्वामी मंदिर 12वीं शताब्दी का प्राचीन मंदिर है। तिरुनाल्लर का यह मंदिर शनि देव को समर्पित है और मान्यता है कि यहां स्नान करने और दर्शन मात्र से शनि दोष, साढ़े साती, अढ़ैया समेत अन्य कष्टों से मुक्ति मिलती है और शनि देव शांत होते हैं। शनि जन्मोत्सव के अवसर पर हर साल बड़ी संख्या में भक्त शनि दोष निवारण के लिए थिरुनल्लार मंदिर पहुंचते हैं।
इस मंदिर का नाम राजा नल से जुड़ा है। किंवदंतियों के अनुसार, निषाद देश के राजा नल को शनि के श्राप के कारण बहुत कष्ट झेलने पड़े। भगवान शिव की कृपा और थिरुनल्लार आने से उन्हें शनि के बुरे प्रभाव से मुक्ति मिली। इसी वजह से इस जगह को ‘नल्लारु’ कहा जाता है, जिसका अर्थ है नल का उद्धार स्थल। माना जाता है कि यहां नल तीर्थ में स्नान करने से व्यक्ति के पिछले जन्मों के पाप और शनि दोष से उत्पन्न सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। यह मंदिर इसलिए भी खास है क्योंकि यहां शनिदेव ने अपनी सारी शक्तियां भगवान शिव (धरबरन्येश्वर) को सौंप दी थीं। तिरुनाल्लर शनिश्वरन मंदिर सात मंदिरों में से एक है, जिन्हें ‘सप्त विदंग स्थल’ भी कहा जाता है।
तिरुनाल्लर शनिश्वरन मंदिर भक्ति के केंद्र में से एक होने के साथ ही 12वीं शताब्दी की वास्तुकला का उत्कृष्ट नमूना भी है। मंदिर का शिखर पांच मंजिला है। महा मंडपम विशाल है, जहां तंजौर शैली की सुंदर चित्रकलाएं बनी हुई हैं। मंदिर में महादेव के मंदिर के साथ ही नवग्रहों को नौ अलग-अलग कुओं के रूप में दिखाया गया है। स्वर्ण गणपति, भगवान मुरुगन, महालक्ष्मी और राजा नल की मूर्तियां यहां की प्रमुख आकर्षण हैं। मंदिर के प्रवेश द्वार पर शनि देव का अलग मंदिर है, जहां मकर और कुंभ राशि के चिह्न बने हैं। शनि का वाहन कौवा सुनहरे रंग का है। मंदिर में 63 संतों की मूर्तियां भी स्थापित हैं।
तिरुनाल्लर केवल धार्मिक केंद्र ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक धरोहर भी है। यहां ब्रह्मोत्सव के दौरान नृत्य और भरतनाट्यम उत्सव का आयोजन होता है। महाशिवरात्रि व अन्य धार्मिक पर्व के अवसर पर विशेष कार्यक्रम होते हैं। प्राकृतिक सौंदर्य की दृष्टि से भी यह जगह मनमोहक है। नल्लंबल झील, नूलार नदी, अरसलार नदी और अगलंकनू जलाशय यहां की प्राकृतिक सुंदरता को बढ़ाते हैं।
तिरुनाल्लर कराईकल शहर से सड़क मार्ग द्वारा आसानी से पहुंचा जा सकता है। तमिलनाडु के विभिन्न हिस्सों से भी यहां अच्छी कनेक्टिविटी है।

