Friday, July 10, 2026
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तारे या गैलेक्सी… दोनों में फर्क कैसे पहचानें? डिफ्रैक्शन स्पाइक्स से दूर होगी उलझन

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नई दिल्ली, 23 मई (आईएएनएस)। अंतरिक्ष की गहराइयों में तारे और गैलेक्सी को देखकर अक्सर भ्रम हो जाता है। अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा ने सोशल मीडिया पर एक खास तस्वीर पोस्ट करते हुए इस उलझन का समाधान बताया है।

नासा के हबल टेलीस्कोप ने अपने आधिकारिक इंस्टाग्राम अकाउंट पर तस्वीर साझा करते हुए लिखा, “तारे या गैलेक्सी?”। हबल स्पेस टेलीस्कोप द्वारा ली गई इस तस्वीर में गैलेक्सियों के एक पूरे समूह को दिखाया गया है, लेकिन इसमें कुछ तारे भी नजर आ रहे हैं। इन दोनों को अलग-अलग पहचानने के आसान तरीके, यानी ‘डिफ्रैक्शन स्पाइक्स’, के बारे में भी नासा ने जानकारी दी।

पोस्ट की गई तस्वीर एमएसीएस जे1141.6-1905 नामक गैलेक्सी क्लस्टर को दिखाती है। इसमें दिखाई देने वाला लगभग हर चमकीला बिंदु एक पूरी गैलेक्सी है, जिसमें लाखों या अरबों तारे मौजूद हैं। हालांकि, कुछ चमकते बिंदु हमारी आकाशगंगा के अपेक्षाकृत पास मौजूद तारे हैं। ऐसे में यह भ्रम होना स्वाभाविक है कि कौन-सा बिंदु तारा है और कौन-सी गैलेक्सी।

नासा के अनुसार, जब किसी तारे या अन्य प्रकाश स्रोत की रोशनी हबल टेलीस्कोप के सेकेंडरी मिरर को सहारा देने वाले ढांचों के किनारों से गुजरती है, तो वह डिफ्रैक्ट होकर चारों ओर नुकीली किरणों या ‘स्पाइक्स’ का रूप ले लेती है। ये डिफ्रैक्शन स्पाइक्स किसी तारे की पहचान का प्रमुख संकेत होते हैं। गैलेक्सी में इतनी स्पष्ट और नुकीली किरणें दिखाई नहीं देतीं।

तस्वीर के निचले दाहिने हिस्से में एक तारा साफ तौर पर डिफ्रैक्शन स्पाइक्स के साथ चमकता दिखाई दे रहा है। वहीं, बाईं ओर अलग-अलग आकार की सर्पिल और अंडाकार गैलेक्सियां फैली हुई हैं।

एमएसीएस जे1141.6-1905 गैलेक्सी समूह ‘क्रेटर’ तारामंडल में स्थित है और पृथ्वी से लगभग 4 अरब प्रकाश वर्ष दूर है। हबल ने इसे दृश्य और इन्फ्रारेड, दोनों तरह की रोशनी में कैद किया है। वैज्ञानिकों ने इस क्लस्टर का अध्ययन गुरुत्वाकर्षण लेंसिंग और एक्स-किरणों में चमकने वाली गैलेक्सिज को समझने के लिए किया है।

हबल स्पेस टेलीस्कोप का आर्काइव आज 1.7 मिलियन से अधिक ऑब्जर्वेशन्स का खजाना बन चुका है। यह डेटा भविष्य के खगोलविदों के लिए बेहद उपयोगी साबित हो रहा है। नासा और यूरोपीय स्पेस एजेंसी ईएसए के सहयोग से तैयार की गई इस तस्वीर को हवाई विश्वविद्यालय के एच एबलिंग और नासा के जी कोबर ने प्रोसेस किया है।