Saturday, May 23, 2026
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रेशम, मसाले और हस्तशिल्प… दक्षिण भारत राज्यों की पहचान बने ये ‘जीआई’ उत्पाद

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नई दिल्ली, 23 मई (आईएएनएस)। भारत की सांस्कृतिक विविधता जितनी विशाल है, उतनी ही समृद्ध उसकी पारंपरिक उत्पादों की विरासत भी है। दक्षिण भारत के गांवों, खेतों और कारीगर बस्तियों में सदियों से तैयार हो रहे कई उत्पाद आज वैश्विक बाजार में अपनी खास पहचान बना चुके हैं। यहां की मिट्टी में बसा स्वाद, कला और परंपरा आज विश्व पटल पर अपनी अलग पहचान बना रहे हैं। गांवों की छोटी-छोटी कार्यशालाओं और खेतों से निकलकर ये उत्पाद अब अमेरिका, यूरोप, जापान और मध्य पूर्व तक पहुंच रहे हैं।

तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और केरल जैसे राज्यों के कई उत्पाद आज दुनिया भर में पसंद किए जा रहे हैं। इन उत्पादों को मिले जीआई यानी ज्योग्राफिकल इंडिकेशन टैग की मान्यता न केवल उनकी प्रामाणिकता को प्रमाणित करती है, बल्कि भारत की परंपरा, शिल्पकला और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी नई ताकत देती है।

दक्षिण भारत के ये जीआई उत्पाद केवल व्यापारिक वस्तुएं नहीं, बल्कि सदियों पुरानी परंपराओं, स्थानीय ज्ञान और सांस्कृतिक विरासत के जीवंत प्रतीक हैं। इन उत्पादों ने ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर पैदा किए हैं। किसान, बुनकर, कारीगर और छोटे उद्यमी आज जीआई टैग की वजह से बेहतर कीमत और वैश्विक पहचान हासिल कर रहे हैं।

जीआई टैग किसी उत्पाद को उसके भौगोलिक मूल स्थान से जोड़ता है। इसका अर्थ है कि वह उत्पाद केवल उसी क्षेत्र में अपनी विशिष्ट गुणवत्ता, तकनीक और परंपरा के साथ तैयार होता है। इससे नकली उत्पादों पर रोक लगती है और स्थानीय कारीगरों व किसानों को आर्थिक लाभ मिलता है। यही कारण है कि भारत में 600 से भी ज्यादा उत्पादों को जीआई टैग मिल चुका है और इनमें दक्षिण भारत के राज्यों की हिस्सेदारी बेहद महत्वपूर्ण है।

तमिलनाडु की पहचान केवल मंदिरों और संस्कृति तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां के पारंपरिक उत्पाद भी दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं। कांचीपुरम सिल्क साड़ी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। शुद्ध रेशम और सोने की जरी से बुनी जाने वाली ये साड़ियां दक्षिण भारतीय विवाहों की शान मानी जाती हैं। कांचीपुरम के हजारों परिवार आज भी पारंपरिक हथकरघों पर इन साड़ियों को तैयार करते हैं। इनकी मजबूती, चमक और डिजाइन इन्हें वैश्विक बाजार में खास बनाते हैं।

इसके अलावा मदुरै मल्लि (चमेली), इरोड हल्दी, कोडाइकनाल मलाई पूंडू (लहसुन), पलानी पंचमीर्थम, श्रीविल्लीपुत्तूर पल्कोवा, कोविलपट्टी कदलाई मितई और नीलगिरि चाय भी तमिलनाडु की पहचान बन चुके हैं। वहीं, राज्य का तंजावुर पेंटिंग, मदुरै सुंगुडी साड़ी, चेत्तिनाड कॉटन, मनप्पराई मुरुक्कू, कुंभकोणम पान का पत्ता, विरुपाक्षी हिल केला, सिरुमलाई हिल केला, थूयामल्ली चावल और वोरैयूर कॉटन साड़ी भी शामिल हैं।

कर्नाटक भी जीआई टैग उत्पादों के मामले में काफी समृद्ध राज्य है। मैसूर सिल्क की भव्यता और चिकनाई देश-विदेश में मशहूर है। वहीं, कूर्ग अरेबिका कॉफी और चिकमगलूर कॉफी की खुशबू अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच चुकी है। ब्याडगी मिर्च अपनी गहरी लाल रंगत और कम तीखेपन के कारण विशेष पहचान रखती है। धारवाड़ पेड़ा, नंजनगुड केला, देवनहल्ली पोमेलो, उडुपी मट्टू गुल्ला बैंगन, मैसूर पान, सिरसी सुपारी और गुलबर्गा अरहर दाल जैसे उत्पाद भी अहम हैं।

इसके अलावा इल्कल साड़ी, मोलकलमुरु सिल्क, किन्नल खिलौने, चन्नापटना खिलौने, नवलगुंड दरी और कर्नाटक कांस्य शिल्प जैसे उत्पाद भी जीआई सूची में शामिल हैं। चन्नापटना के लकड़ी के खिलौने विशेष रूप से पर्यावरण अनुकूल होने के कारण विदेशी बाजारों में लोकप्रिय हो रहे हैं।

केरल को मसालों और चावल का स्वर्ग भी कहा जाता है। यहां की मिट्टी मसालों के लिए जानी जाती है। मालाबार काली मिर्च, वायनाड जीरकसल चावल, पोक्काली चावल, पलक्कड़ मट्टा चावल, वजहकुलम अनानास, मरयूर गुड़, तिरूर सुपारी और नीलांबुर सागौन प्रमुख जीआई उत्पाद हैं। एथोमोझी लंबा नारियल और एलेप्पी हरी इलायची भी अपनी गुणवत्ता के लिए प्रसिद्ध हैं। केरल का नवारा चावल आयुर्वेदिक गुणों के कारण खास माना जाता है।

आंध्र प्रदेश के जीआई उत्पादों में तिरुपति लड्डू सबसे चर्चित नाम है। मंदिर परंपरा से जुड़ा यह प्रसाद अपनी गुणवत्ता और स्वाद के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है। तिरुपति लड्डू के अलावा, गुंटूर मिर्च, बंगनपल्ले आम, कोंडापल्ली खिलौने और एटिकोप्पाका खिलौने विश्व प्रसिद्ध हैं।

वहीं, तेलंगाना की हैदराबादी हलीम तो हर कोई जानता है। इसके अलावा पोचमपल्ली इकत, नरायणपेट साड़ी, वारंगल दरी, चेरियल स्क्रॉल पेंटिंग और निजामाबाद ब्लैक पॉटरी भी जीआई टैग प्राप्त हैं। लिस्ट यहीं खत्म नहीं होती बल्कि इसमें वारंगल दरी, नरायणपेट साड़ी, चेरियल स्क्रॉल पेंटिंग और निजामाबाद ब्लैक पॉटरी भी राज्य की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत बनाते हैं। तेलंगाना इमली, आदिलाबाद डोकरा कला और गडवाल साड़ी जैसे उत्पाद भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी जगह बना रहे हैं।