Wednesday, May 27, 2026
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एसआईआर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले की योगेंद्र यादव ने की आलोचना, भाजपा ने किया पलटवार

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नई दिल्ली, 27 मई (आईएएनएस)। याचिकाकर्ता और राजनीतिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव ने एसआईआर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले की योगेंद्र यादव ने आलोचना की है। वहीं, भाजपा ने बुधवार को विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के संबंध में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सवाल उठाने वाली टिप्पणियों की कड़ी आलोचना की। भाजपा ने कहा कि शीर्ष अदालत पर यह आरोप लगाना कि उसने अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी छोड़ दी है, ‘लापरवाह, गैर-जिम्मेदाराना और संस्थाओं पर विश्वास को कमजोर करने वाला’ है।

यह प्रतिक्रिया सुप्रीम कोर्ट द्वारा चुनाव आयोग के एसआईआर कराने के फैसले को बरकरार रखने के बाद आई है। शीर्ष अदालत ने कहा था कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण चुनाव आयोग के संवैधानिक और वैधानिक अधिकार क्षेत्र में आता है और इसका उद्देश्य चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता और शुद्धता बनाए रखना है।

फैसले की आलोचना पर प्रतिक्रिया देते हुए भाजपा आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने शीर्ष अदालत का बचाव किया और कहा कि न्यायिक फैसलों की आलोचना लोकतांत्रिक और संवैधानिक सीमाओं के भीतर ही होनी चाहिए।

उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, ”यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि सुप्रीम कोर्ट के समक्ष एक याचिकाकर्ता ने प्रतिकूल फैसले के बाद देश की सर्वोच्च संवैधानिक अदालत पर आरोप लगाए हैं। किसी को फैसले से असहमति हो सकती है, उसकी तर्कसंगत आलोचना की जा सकती है या कानूनी तरीके से पुनर्विचार याचिका दायर की जा सकती है, यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है लेकिन अदालत को यह कहना कि उसने अपनी जिम्मेदारी छोड़ दी या जानबूझकर मताधिकार छीनने में भूमिका निभाई, लापरवाह और गैर-जिम्मेदाराना है।”

अमित मालवीय ने यह टिप्पणी याचिकाकर्ता और राजनीतिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव की आलोचना के जवाब में की, जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सवाल उठाए थे।

भाजपा नेता ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों की विस्तृत दलीलें सुनने के बाद यह निर्णय दिया है। उन्होंने कहा, ”सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों की विस्तृत दलीलें सुनने के बाद एसआईआर की संवैधानिकता को सही ठहराया है। इस फैसले को सिर्फ इसलिए पहले से तय बताकर खारिज कर देना कि यह किसी की राजनीतिक या वैचारिक स्थिति से मेल नहीं खाता, न सिर्फ कोर्ट का, बल्कि संवैधानिक प्रक्रिया का भी अपमान है।”

अमित मालवीय ने कहा, ”और भी अधिक आश्चर्य की बात यह है कि याचिकाकर्ता खुद को लोकतंत्र और नैतिकता का एकमात्र संरक्षक बताने की कोशिश कर रहे हैं। यह दिखावा शायद तभी गंभीर लगता जब यह किसी ऐसे व्यक्ति से आता जिसके पास बौद्धिक ईमानदारी और संस्थाओं के प्रति सम्मान का रिकॉर्ड हो।”

उन्होंने कहा कि संस्थाओं की आलोचना की आड़ में उन पर अविश्वास पैदा करने की कोशिश नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा, ”संस्थाओं की आलोचना का अधिकार उन्हें कमजोर करने का अधिकार नहीं देता, खासकर तब जब फैसले उनके पक्ष में न हों।”

उन्होंने कहा, ”भारत का लोकतंत्र उन स्वयंभू सुधारकों की निराशा से कहीं अधिक मजबूत है जो मानते हैं कि हर संस्था तभी वैध है जब वह उनके अनुसार फैसला दे।”