Thursday, May 28, 2026
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लोकसभा अध्यक्ष ने वीर सावरकर को पुष्पांजलि अर्पित की, बोले- युवाओं में देशभक्ति की जगाई अलख

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नई दिल्ली, 28 मई (आईएएनएस)। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने गुरुवार को स्वतंत्रता सेनानी वीर विनायक दामोदर सावरकर की जयंती के अवसर पर संसद के केंद्रीय कक्ष में उन्हें पुष्पांजलि अर्पित की।

इस दौरान केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण तथा रसायन एवं उर्वरक मंत्री जेपी नड्डा, संसदीय कार्य एवं अल्पसंख्यक कार्य मंत्री किरेन रिजिजू, विधि एवं न्याय तथा संसदीय कार्य राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) अर्जुनराम मेघवाल, भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन, संसद सदस्यों तथा पूर्व सांसदों ने भी वीर सावरकर को श्रद्धांजलि अर्पित की।

ओम बिरला ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, ”मातृभूमि के प्रति अटूट समर्पण के प्रतीक, महान क्रांतिकारी विनायक दामोदर सावरकर जी की जयंती पर संविधान सदन के केंद्रीय कक्ष में पुष्पांजलि अर्पित की। स्वातंत्र्यवीर सावरकर जी ने भारत की स्वतंत्रता के लिए अपना सम्पूर्ण जीवन राष्ट्र को समर्पित कर दिया। उन्होंने न केवल देश में, बल्कि विदेशों में रहकर भी क्रांतिकारी विचारधारा को मजबूत किया और अनेक युवाओं में देशभक्ति की अलख जगाई। अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध उनके विचार, लेखनी और संगठन क्षमता ने स्वतंत्रता आंदोलन को नई ऊर्जा प्रदान की।”

उन्होंने लिखा, ”कठोर कारावास और प्रताड़नाओं के बावजूद उन्होंने हर परिस्थिति में राष्ट्रहित और स्वाधीनता के संकल्प को सर्वोपरि रखा। सावरकर जी का जीवन त्याग, संघर्ष, साहस और अटूट इच्छाशक्ति का अद्वितीय उदाहरण है। भारत की एकता, आत्मगौरव और सांस्कृतिक चेतना के प्रति उनका चिंतन आज भी करोड़ों देशवासियों को प्रेरित करता है।”

स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर, जिन्हें वीर सावरकर के नाम से जाना जाता है, का जन्म 28 मई 1883 को हुआ था। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के एक महान व्यक्तित्व के रूप में वे क्रांतिकारी, कवि, लेखक तथा दूरदर्शी समाज सुधारक के रूप में जाने जाते हैं। वीर सावरकर ने 20वीं शताब्दी के प्रारंभिक दौर में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध प्रतिरोध की भावना को जागृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

उन्होंने स्वतंत्रता के उद्देश्य से युवाओं को संगठित एवं प्रेरित करने के लिए क्रांतिकारी संगठनों की स्थापना की। उनका अदम्य साहस अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह की कुख्यात सेल्युलर जेल में कारावास के दौरान विशेष रूप से दिखाई दिया, जहां उन्होंने अत्यंत कठिन परिस्थितियों का दृढ़ संकल्प के साथ सामना किया। अपने क्रांतिकारी विचारों के अतिरिक्त वे सामाजिक सुधार एवं आधुनिकीकरण के भी प्रबल समर्थक थे। उन्होंने तर्कवाद, सामाजिक कुरीतियों के उन्मूलन तथा प्रगतिशील भारतीय समाज के निर्माण के आदर्शों का समर्थन किया। उनकी विरासत उनके लेखन, राष्ट्रीय स्वतंत्रता के लिए उनके अथक प्रयासों तथा एक सशक्त और आत्मनिर्भर भारत की उनकी परिकल्पना के माध्यम से आज भी जीवित है। उनका जीवन देशभक्ति, धैर्य एवं सुधार का प्रेरणादायक उदाहरण बना हुआ है।