नई दिल्ली, 2 जून (आईएएनएस)। तृप्ति मुर्गंडे की गिनती भारत की बेहतरीन बैडमिंटन खिलाड़ियों में की जाती है। उन्होंने उस दौर में इस खेल में उल्लेखनीय सफलताएं हासिल कीं, जब खिलाड़ियों को आज जैसी सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं। तीन बार राष्ट्रीय चैंपियनशिप के फाइनल में हार का सामना करने के बावजूद तृप्ति ने हिम्मत नहीं हारी और चौथे प्रयास में राष्ट्रीय चैंपियन बनने का गौरव हासिल किया। इसके अलावा, उन्होंने राष्ट्रमंडल खेलों की टीम स्पर्धा में भारत को कांस्य पदक दिलाने में भी अहम भूमिका निभाई।
तृप्ति मुर्गंडे का जन्म 3 जून 1982 को पुणे में हुआ था। उन्हें बचपन से ही बैडमिंटन में गहरी रुचि थी। महज नौ वर्ष की उम्र में उन्होंने पुणे स्थित एक अकादमी में दाखिला लिया और वसंत गोरे के मार्गदर्शन में खेल की बारीकियां सीखीं।
बैडमिंटन के प्रति उनके जुनून का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कम उम्र में ही वह अपने खेल को निखारने के लिए बेंगलुरु पहुंच गईं। वहां उन्होंने प्रकाश पादुकोण की अकादमी में प्रशिक्षण लिया। कड़ी मेहनत और लगातार अभ्यास का नतीजा यह रहा कि वह जल्द ही जूनियर स्तर पर राष्ट्रीय चैंपियन बन गईं।
हालांकि, तृप्ति को नेशनल चैंपियन बनने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा। तृप्ति का नेशनल चैंपियन बनने का सपना तीन बार बेहद करीब आकर टूटा। वह फाइनल तक पहुंची, लेकिन तीनों बार उन्हें खिताबी मुकाबले में हार का सामना करना पड़ा। आखिरकार वर्ष 2009 में उनका इंतजार समाप्त हुआ और वह महिला एकल राष्ट्रीय बैडमिंटन चैंपियन बनीं।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी तृप्ति ने अपनी अलग पहचान बनाई। दक्षिण एशियाई खेलों में उनका प्रदर्शन शानदार रहा, जहां उन्होंने कुल पांच स्वर्ण पदक जीते। इनमें 2004 और 2006 की एकल स्पर्धाओं के स्वर्ण पदक भी शामिल हैं।
वर्ष 2006 में मेलबर्न में आयोजित राष्ट्रमंडल खेलों में तृप्ति भारतीय टीम का हिस्सा रहीं, जिसने टीम स्पर्धा में कांस्य पदक जीता। अपने करियर के दौरान उन्होंने छह अंतरराष्ट्रीय खिताब भी अपने नाम किए। बैडमिंटन में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें वर्ष 2020 में ध्यानचंद पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
संन्यास के बाद तृप्ति भारतीय राष्ट्रीय बैडमिंटन टीम की चयनकर्ता भी रहीं। इसके अलावा, उन्होंने खेलो इंडिया कार्यक्रम के तहत टैलेंट स्काउट के रूप में भी काम किया और कई प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को आगे बढ़ाने में योगदान दिया।
तृप्ति मुर्गंडे की गिनती उन खिलाड़ियों में की जाती है, जिन्होंने हालातों और मुश्किलों के आगे हार नहीं मानी। तृप्ति का खुद कहना है कि खेल ने उन्हें विपरीत परिस्थितियों में लड़ना और आगे बढ़ते रहने का हुनर सिखाया।

