Monday, June 8, 2026
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वी. शांताराम ने सबसे पहले पहचानी थी प्रतिभा, हारमोनियम की धुनों संग शुरू हुआ वसंत देसाई का सफर

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मुंबई, 8 जून (आईएएनएस)। भारतीय सिनेमा के महान संगीतकारों में गिने जाने वाले वसंत देसाई का जीवन संघर्ष, प्रतिभा और समर्पण का अद्भुत उदाहरण है। एक समय ऐसा था जब वह दिनभर फिल्म कंपनी में सामान्य काम किया करते थे और रात में अपने शौक के लिए हारमोनियम बजाते थे लेकिन उनकी यही लगन एक दिन उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा मोड़ बन गई। उनकी धुनों से प्रभावित होकर फिल्म निर्माता-निर्देशक वी. शांताराम ने उन्हें संगीत विभाग में काम करने का मौका दिया और यहीं से उनके शानदार संगीत सफर की शुरुआत हुई।

वसंत देसाई का जन्म 9 जून 1912 को महाराष्ट्र के सावंतवाड़ी क्षेत्र के सुनावड़े गांव में हुआ था। उनका बचपन सिंधुदुर्ग जिले के कुडाल कस्बे में बीता। कोंकण क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं और लोकनाट्यों का प्रभाव बचपन से ही उनके मन पर पड़ा। संगीत और अभिनय में उनकी रुचि धीरे-धीरे बढ़ती गई और वह स्थानीय नाटकों में हिस्सा लेने लगे।

हायर एजुकेशन के लिए वह साल 1929 में कोल्हापुर पहुंचे। यहीं उनकी मुलाकात फिल्मकार वी. शांताराम से हुई, जो उस समय प्रभात फिल्म कंपनी के प्रमुख स्तंभों में से एक थे। वसंत देसाई ने प्रभात फिल्म कंपनी में काम करना शुरू कर दिया। शुरुआती दौर में उन्होंने खूब संघर्ष किया और वह संघर्ष उन्हें पहचान दिलाने में सफल भी रही।

प्रभात फिल्म कंपनी में काम करते समय वसंत देसाई का संगीत प्रेम लगातार बना रहा। दिनभर की मेहनत के बाद वह रात में आराम करने से पहले हारमोनियम बजाते थे। एक रात उनकी मधुर धुनें वी. शांताराम के कानों तक पहुंचीं। संगीत के प्रति उनकी समझ और प्रतिभा को पहचानते हुए शांताराम ने उन्हें संगीत विभाग में सहायक के रूप में नियुक्त कर दिया।

इसके बाद वसंत देसाई को अनुभवी संगीतकारों के साथ काम करने का अवसर मिला। प्रभात फिल्म कंपनी की पहली बोलती फिल्म ‘अयोध्या का राजा’ में उन्होंने सहायक संगीत निर्देशक के रूप में योगदान दिया। इस दौरान उन्होंने संगीत की बारीकियों को गहराई से समझा और अपनी अलग पहचान बनानी शुरू की।

वसंत देसाई ने मराठी नाटकों के लिए भी संगीत तैयार किया। हिंदी फिल्मों में उन्हें पहला बड़ा अवसर साल 1942 में मिला। इसी साल आई फिल्म ‘शकुंतला’ ने उन्हें घर-घर में लोकप्रिय कर दिया। यह फिल्म वी. शांताराम के राजकमल स्टूडियो की पहली प्रस्तुति थी। फिल्म के गीतों और संगीत को दर्शकों ने खूब पसंद किया, जिससे वसंत देसाई का नाम इंडस्ट्री में तेजी से चर्चित हो गया।

वसंत देसाई के संगीत की सबसे बड़ी विशेषता शास्त्रीय संगीत की गहराई और मधुरता थी। उनके गीतों में भारतीय रागों की खूबसूरती साफ झलकती थी। उन्होंने कई यादगार फिल्मों और मराठी सिनेमा के लिए संगीत दिया। ‘श्यामची आई’, ‘मोलकरण’, ‘लक्ष्मण रेखा’ और ‘कांचन गंगा’ जैसी फिल्मों में उनके संगीत को विशेष सराहना मिली।

हालांकि, व्यावसायिक सफलता हमेशा उनके साथ नहीं रही, लेकिन संगीत जगत में उनकी प्रतिभा का सम्मान हमेशा किया गया। संगीतकार अनिल विश्वास जैसे दिग्गज भी उनकी संगीत समझ की प्रशंसा करते थे। ‘मालिक तेरे बंदे हम’ और ‘हमको मन की शक्ति देना’ जैसे अमर गीत आज भी उनकी संगीत प्रतिभा की पहचान बने हुए हैं।