Monday, June 29, 2026
SGSU Advertisement
Home राष्ट्रीय हूल की हुंकार: जब जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए...

हूल की हुंकार: जब जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए उठी थी आजादी की पहली जनगर्जना

0
5

नई दिल्ली, 29 जून (आईएएनएस)। तारीख थी 30 जून और साल था 1855। साहिबगंज के भोगनाडीह गांव की धरती पर हजारों संथालों की भीड़ उमड़ी थी। चारों ओर एक ही स्वर गूंज रहा था, “हूल!” यानी क्रांति। यह आवाज केवल अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ नहीं थी, बल्कि उस अन्याय के विरुद्ध थी जिसने आदिवासियों से उनका जल, जंगल और जमीन छीनने की कोशिश की थी। यह हुंकार इतनी बुलंद थी कि उसकी गूंज लंदन की ब्रिटिश संसद तक सुनाई दी।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की चर्चा अक्सर 1857 की क्रांति से शुरू होती है, लेकिन उससे दो वर्ष पहले संथाल समुदाय ने अंग्रेजी हुकूमत की नींव हिला दी थी। 30 जून 1855 को भोगनाडीह से शुरू हुई इस क्रांति में करीब 60 हजार संथालों ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी, जमींदारों, महाजनों और साहूकारों के खिलाफ संघर्ष का बिगुल फूंका। संथाली भाषा में ‘हूल’ का अर्थ ही है, विद्रोह या क्रांति। यह केवल सत्ता परिवर्तन की लड़ाई नहीं थी, बल्कि सम्मान और अस्तित्व बचाने का आंदोलन था।

ब्रिटिश शासन के दौरान आदिवासियों पर भारी करों का बोझ डाला गया। महाजनों और जमींदारों ने कर्ज और सूद के जाल में उन्हें फंसाया। बाहरी लोगों, जिन्हें संथाल ‘दिकु’ कहते थे, द्वारा उनके संसाधनों और अधिकारों का लगातार दोहन किया जा रहा था। जल, जंगल और जमीन केवल संसाधन नहीं थे, बल्कि आदिवासी जीवन, संस्कृति और पहचान का आधार थे। जब इन्हीं पर संकट आया तो प्रतिरोध अनिवार्य हो गया।

इस ऐतिहासिक आंदोलन का नेतृत्व चार सगे भाइयों, सिद्धू, कान्हू, चांद और भैरव ने किया। उन्होंने हजारों लोगों को संगठित कर अंग्रेजों के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध छेड़ दिया लेकिन यह केवल पुरुषों का आंदोलन नहीं था। उनकी बहनों फूलो और झानो ने महिलाओं को संगठित कर संघर्ष की अग्रिम पंक्ति में खड़ा किया। आदिवासी समाज में महिलाओं की भागीदारी का यह उदाहरण आज भी प्रेरणा देता है।

हूल क्रांति को कुचलने के लिए अंग्रेजों ने अभूतपूर्व दमन किया। अनुमान है कि करीब 20 हजार संथाल इस संघर्ष में शहीद हुए। सिद्धू और कान्हू को गिरफ्तार कर फांसी दे दी गई लेकिन उनकी शहादत व्यर्थ नहीं गई। आंदोलन के दबाव में ब्रिटिश सरकार को संथाल क्षेत्र के लिए अलग प्रशासनिक व्यवस्था बनानी पड़ी। 1856 में संथाल परगना का गठन किया गया। बाद में संथाल परगना काश्तकारी कानून अस्तित्व में आया, जिसने आदिवासी भूमि की सुरक्षा को कानूनी आधार दिया।

हर वर्ष 30 जून को झारखंड सहित बिहार, पश्चिम बंगाल और ओडिशा के आदिवासी इलाकों में संथाल हूल दिवस श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। सिद्धू-कान्हू और अन्य शहीदों की प्रतिमाओं पर माल्यार्पण किया जाता है। पारंपरिक नृत्य, मांदर की थाप, लोकगीत, सांस्कृतिक कार्यक्रम और मेलों के माध्यम से नई पीढ़ी को इस गौरवशाली इतिहास से परिचित कराया जाता है।

यह आंदोलन भारत के स्वतंत्रता संग्राम की उस अनदेखी गाथा का हिस्सा है, जिसे राष्ट्रीय विमर्श में जितना स्थान मिलना चाहिए था, उतना अब भी नहीं मिला है। 30 जून का यह दिन केवल अतीत को याद करने का अवसर नहीं, बल्कि उस संकल्प को दोहराने का दिन है कि जल, जंगल, जमीन, संस्कृति और सामाजिक न्याय की रक्षा के लिए उठी हर आवाज लोकतंत्र की सबसे मजबूत नींव होती है।