नई दिल्ली, 7 जुलाई (आईएएनएस)। तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख और पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए राज्य से राज्यसभा की तीन सीटों पर होने वाला आगामी उपचुनाव एक बड़ी राजनीतिक परीक्षा साबित हो सकता है। मौजूदा विधानसभा गणित भाजपा के पक्ष में दिखाई दे रहा है, जबकि तृणमूल कांग्रेस के भीतर विभाजन की स्थिति बनी हुई है।
24 जुलाई को होने वाले राज्यसभा उपचुनाव में मौजूदा संख्या बल के आधार पर तीनों सीटें भाजपा के खाते में जाने की संभावना जताई जा रही है। वहीं, चुनाव आयोग के समक्ष तृणमूल कांग्रेस के ‘वास्तविक’ संगठन को लेकर भी फैसला लंबित है।
पश्चिम बंगाल विधानसभा में भाजपा के पास फिलहाल 206 विधायक हैं। मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने नंदीग्राम सीट छोड़कर भवानीपुर सीट से चुनाव लड़ा था, जहां उन्होंने ममता बनर्जी को हराया था। इसके अलावा एक अन्य सीट भी खाली है, क्योंकि पूर्व तृणमूल नेता हुमायूं कबीर दो विधानसभा सीटों से चुनाव जीत गए थे। इस कारण विधानसभा की प्रभावी सदस्य संख्या 294 से कम हो गई है।
राज्यसभा चुनाव में एकल हस्तांतरणीय मत (सिंगल ट्रांसफरेबल वोट) प्रणाली लागू होती है। मौजूदा आंकड़ों के अनुसार भाजपा के पास तीनों सीटें जीतने के लिए पर्याप्त प्रथम वरीयता मत मौजूद हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, तृणमूल कांग्रेस दो गुटों में बंटी हुई है। एक गुट का नेतृत्व ऋतब्रत बनर्जी कर रहे हैं, जिसके साथ लगभग 62 से 65 विधायक बताए जा रहे हैं। बाकी विधायक ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले “कालीघाट गुट” के साथ हैं।
ऐसी स्थिति में दोनों गुटों में से कोई भी अकेले राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए आवश्यक संख्या तक नहीं पहुंच पा रहा है। इस विभाजन के कारण तृणमूल कांग्रेस के लिए कम से कम एक सीट जीतने की संभावना भी लगभग खत्म होती दिख रही है और भाजपा को स्पष्ट बढ़त मिलती नजर आ रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अतीत में भी दलों में टूट और विधायकों के पाला बदलने से राज्यसभा चुनावों के नतीजे प्रभावित होते रहे हैं। कई मौकों पर क्षेत्रीय दलों के विधायकों के भाजपा के साथ जाने से राज्यसभा का गणित बदला है और भाजपा को फायदा हुआ है।
विशेषज्ञों के अनुसार, राज्यसभा चुनावों में अक्सर जनमत से अधिक विधानसभा का अंकगणित निर्णायक भूमिका निभाता है और पश्चिम बंगाल में भी यही स्थिति दिखाई दे रही है।
कालीघाट गुट के लिए 24 जुलाई के चुनाव में संभावित रूप से कोई सीट न जीत पाना केवल प्रतीकात्मक हार नहीं होगी, बल्कि इससे ममता बनर्जी का संगठन पर दावा भी कमजोर पड़ सकता है। साथ ही पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह को लेकर चल रहे विवाद में बागी गुट की स्थिति मजबूत हो सकती है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इससे आगे और टूट-फूट या कानूनी लड़ाइयों की संभावना भी बढ़ सकती है कि आखिर असली टीएमसी कौन है।
ऐसे में तृणमूल कांग्रेस के भीतर नेतृत्व और पार्टी की पहचान को लेकर संघर्ष और तेज हो सकता है। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले कालीघाट गुट के सामने संगठन और राजनीतिक प्रभाव बनाए रखने की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है।
लेख में कहा गया है कि ममता बनर्जी को लंबे समय से संघर्ष, दृढ़ता और विपरीत परिस्थितियों में भी टिके रहने वाली नेता के रूप में देखा जाता रहा है। उनके समर्थकों के लिए वह उम्मीद और भरोसे का प्रतीक रही हैं, लेकिन आने वाला समय उनके राजनीतिक जीवन की सबसे कठिन चुनौतियों में से एक साबित हो सकता है। हालांकि, ममता बनर्जी इससे पहले भी कई कठिन परिस्थितियों का सामना कर अपनी राजनीतिक क्षमता साबित कर चुकी हैं।

