नई दिल्ली, 12 जुलाई (आईएएनएस) विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने उच्च शिक्षा संस्थानों में दिव्यांग विद्यार्थियों को पढ़ाई, मूल्यांकन और परीक्षाओं में बेहतर अवसर उपलब्ध कराने के लिए व्यापक दिशा-निर्देशों पर बल दे रहा है। आयोग का कहना है कि दिव्यांग विद्यार्थियों को पर्याप्त तैयारी, निरंतर शैक्षणिक सहयोग, परीक्षा में अतिरिक्त समय तथा सुलभ मूल्यांकन व्यवस्था उपलब्ध कराना आवश्यक है, ताकि वे अन्य विद्यार्थियों के समान अवसर प्राप्त कर सकें।
यूजीसी के अनुसार, नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गनाइजेशन (एनएसएसओ) की 2011 की रिपोर्ट में देश की कुल आबादी का 2.2 प्रतिशत हिस्सा दिव्यांग बताया गया था। यह आंकड़ा उस समय लागू दिव्यांगजन अधिकार कानून, 1995 के तहत मान्यता प्राप्त सात प्रकार की दिव्यांगताओं पर आधारित था। इनमें ग्रामीण क्षेत्रों में दिव्यांगता की दर 2.3 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 2 प्रतिशत दर्ज की गई थी। रिपोर्ट के अनुसार पुरुषों में दिव्यांगता की दर 2.4 प्रतिशत जबकि महिलाओं में 1.9 प्रतिशत थी।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि 2.2 प्रतिशत दिव्यांग आबादी में से केवल 1.46 करोड़ लोग साक्षर थे। उच्च शिक्षा में दिव्यांग विद्यार्थियों की भागीदारी बेहद कम रही और कुल विद्यार्थियों में उनका नामांकन मात्र 0.56 प्रतिशत पाया गया। आंकड़े यह संकेत देते हैं कि विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में दिव्यांग व्यक्तियों की शिक्षा में भागीदारी बढ़ाने तथा महिलाओं की साक्षरता दर में सुधार के लिए अतिरिक्त प्रयासों की आवश्यकता है। इसी आवश्यकता को देखते हुए उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए दिव्यांग विद्यार्थियों की शिक्षण आवश्यकताओं के अनुरूप क्रेडिट आधारित पाठ्यक्रमों के शैक्षणिक पहलुओं पर दिशा-निर्देश तैयार किए गए हैं। इनका उद्देश्य शिक्षण, मूल्यांकन और परीक्षा प्रक्रियाओं को अधिक समावेशी बनाना है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में भी उच्च शिक्षा के क्षेत्र में समानता और समावेशन को प्रमुख लक्ष्य बनाया गया है। नीति में खुली और दूरस्थ शिक्षा, ऑनलाइन शिक्षा तथा तकनीक के व्यापक उपयोग के माध्यम से सभी विद्यार्थियों तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पहुंचाने पर जोर दिया गया है। नीति के तहत अकादमिक बैंक ऑफ क्रेडिट की व्यवस्था लागू की गई है, जिससे स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर के विद्यार्थियों को निर्धारित अवधि के भीतर कई बार प्रवेश और निकास की सुविधा मिलती है।
इसके अंतर्गत प्रमाणपत्र के लिए 40, डिप्लोमा के लिए 84, स्नातक डिग्री के लिए 120 तथा ऑनर्स अथवा शोध डिग्री के लिए 160 क्रेडिट निर्धारित किए गए हैं। यूजीसी का कहना है कि विकल्प आधारित क्रेडिट प्रणाली विद्यार्थियों को अपनी रुचि और आवश्यकता के अनुसार पाठ्यक्रम चुनने का अवसर प्रदान करती है। यह व्यवस्था दिव्यांग विद्यार्थियों सहित सभी विद्यार्थियों को मुख्य, वैकल्पिक तथा कौशल आधारित विषयों के चयन में लचीलापन देती है।
इस प्रणाली का उद्देश्य शिक्षा में बढ़ती वैश्विक प्रतिस्पर्धा के अनुरूप पाठ्यक्रमों को आधुनिक बनाना तथा विभिन्न संस्थानों के बीच क्रेडिट हस्तांतरण को आसान बनाना है। इसके साथ ही मूल्यांकन प्रणाली को भी विद्यार्थियों के सीखने के परिणामों, पाठ्यभार और शिक्षण घंटों के आधार पर अधिक प्रभावी बनाने का प्रयास किया जा रहा है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित समूहों, महिलाओं, भौगोलिक रूप से पिछड़े क्षेत्रों के विद्यार्थियों तथा दिव्यांग विद्यार्थियों के लिए शिक्षा तक समान पहुंच सुनिश्चित करने पर विशेष जोर दिया गया है।
नई शिक्षा नीति में गुणवत्तापूर्ण विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों की स्थापना, वंचित विद्यार्थियों के लिए छात्रवृत्ति, ऑनलाइन एवं दूरस्थ शिक्षा का विस्तार तथा सभी शैक्षणिक ढांचे और अध्ययन सामग्री को दिव्यांग अनुकूल बनाने की सिफारिश की गई है। यूजीसी का मानना है कि शिक्षा सामाजिक और आर्थिक समानता स्थापित करने का सबसे प्रभावी माध्यम है। इसलिए उच्च शिक्षा संस्थानों में ऐसी समावेशी शिक्षण पद्धति विकसित करना आवश्यक है, जिससे दिव्यांग विद्यार्थियों सहित सभी शिक्षार्थियों को समान अवसर मिल सकें और वे देश के विकास में सक्रिय योगदान दे सकें।
–आईएएनएस
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