नई दिल्ली, 22 जुलाई (आईएएनएस)। देश की आजादी में कई लोगों का योगदान रहा है। हालांकि, कुछ ऐसे भी थे जिन्होंने आजादी की चिंगारी को जन-जन तक पहुंचाया और लोगों के दिलों में उम्मीद जगाई कि वे भी आजाद भारत का सपना देख सकते हैं। उन्हीं में से एक लोकमान्य बालगंगाधर तिलक भी हैं। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का नाम अत्यंत सम्मान और गौरव के साथ लिया जाता है।
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने न केवल अंग्रेजी शासन के विरुद्ध जनमत तैयार किया बल्कि भारतीयों के मन में स्वतंत्रता की ऐसी लौ जलाई जिसने पूरे देश को एक सूत्र में बांध दिया। उनका प्रसिद्ध उद्घोष स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा, आज भी देशभक्ति और आत्मसम्मान का प्रतीक माना जाता है।
लोकमान्य तिलक का जन्म 23 जुलाई 1856 को महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले में हुआ था। उनका प्रारंभिक नाम केशव गंगाधर तिलक था। उन्होंने पुणे के दक्कन कॉलेज से गणित में स्नातक किया तथा बाद में बॉम्बे विश्वविद्यालय से कानून (एलएलबी) की डिग्री प्राप्त की। शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने शिक्षक के रूप में कार्य किया लेकिन शीघ्र ही पत्रकारिता और समाजसेवा को अपना जीवन-ध्येय बना लिया।
तिलक ने मराठी भाषा में ‘केसरी’ और अंग्रेजी में ‘द मराठा’ नामक समाचार-पत्रों की स्थापना की। इन पत्रों के माध्यम से उन्होंने अंग्रेजी शासन की अन्यायपूर्ण नीतियों की कठोर आलोचना की और लोगों में राष्ट्रीय चेतना का संचार किया। उनके लेखों ने जनता को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक बनाया और स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा दी।
1896-97 में महाराष्ट्र में फैली प्लेग महामारी के दौरान अंग्रेजी सरकार की कठोर नीतियों का तिलक ने खुलकर विरोध किया। इसके कारण उन पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया और उन्हें 18 महीने की जेल हुई। बाद में 1908 में क्रांतिकारियों खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चंद्र चाकी के समर्थन में ‘केसरी’ में लेख लिखने के कारण उन्हें फिर से गिरफ्तार कर बर्मा के मंडले कारागार में छह वर्ष के कठोर कारावास की सजा दी गई। इसी दौरान उन्होंने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘गीता रहस्य’ की रचना की, जिसमें उन्होंने कर्मयोग और राष्ट्रसेवा का संदेश दिया।
लोकमान्य तिलक केवल राजनीतिक नेता ही नहीं बल्कि समाज सुधारक भी थे। उन्होंने गणेश उत्सव और शिवाजी उत्सव को सार्वजनिक रूप देकर लोगों में राष्ट्रीय एकता और देशभक्ति की भावना को मजबूत किया। इन आयोजनों के माध्यम से वे युवाओं को संगठित करते और अंग्रेजी शासन के विरुद्ध जागरुकता फैलाते थे। उनके प्रयासों से स्वतंत्रता आंदोलन जन-आंदोलन का रूप लेने लगा।
तिलक, लाला लाजपत राय और बिपिन चंद्र पाल की त्रयी ‘लाल-बाल-पाल’ के नाम से प्रसिद्ध हुई। इन नेताओं ने उग्र राष्ट्रवाद को नई शक्ति दी और स्वराज की मांग को पूरे देश में लोकप्रिय बनाया। महात्मा गांधी ने तिलक को “आधुनिक भारत का निर्माता” कहा जबकि उन्हें “भारतीय अशांति के जनक” के नाम से भी जाना जाता है।
1 अगस्त 1920 को लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का निधन हो गया। उनका संपूर्ण जीवन राष्ट्रसेवा, त्याग और संघर्ष का एक प्रेरणादायक उदाहरण है। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। आज भी उनका जीवन हमें साहस, आत्मविश्वास और देशभक्ति की प्रेरणा देता है।

