मुंबई, 28 जुलाई (आईएएनएस)। शिवसेना (यूबीटी) ने मुखपत्र ‘सामना’ के संपादकीय में केंद्र की भाजपा सरकार और उत्तर प्रदेश पुलिस पर निशाना साधा। पार्टी ने आरोप लगाया कि जंतर-मंतर पर नीट-यूजी परीक्षा में अनियमितताओं के खिलाफ हुए आंदोलन के दौरान प्रदर्शनकारियों को भोजन और पानी उपलब्ध कराने वाले सामाजिक कार्यकर्ता मोहम्मद जुनैद और शादाब सैफी को राजनीतिक कारणों से निशाना बनाया जा रहा है।
संपादकीय में दावा किया गया कि उत्तर प्रदेश पुलिस ने जुनैद ही नहीं, बल्कि उनके पूरे परिवार को भी परेशान किया। इसमें उनके माता-पिता, बहन और ससुराल पक्ष के लोगों को भी कई बार पुलिस थानों में ले जाकर करीब 12-12 घंटे तक बैठाए रखने का आरोप लगाया गया। पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि 35 दिनों तक चले राहत अभियान के लिए धन कहां से आया, जिसके जरिए हर दिन हजारों प्रदर्शनकारियों को भोजन उपलब्ध कराया गया।
शिवसेना (यूबीटी) ने आरोप लगाया कि प्रशासन ने आंदोलन को कमजोर करने के लिए प्रदर्शन स्थल तक खाने-पीने की व्यवस्था रोकने की कोशिश की। संपादकीय के अनुसार, आसपास के होटल, ठेले और कनॉट प्लेस क्षेत्र में भोजन पहुंचाने वाली सेवाओं को भी बंद कराने के निर्देश दिए गए। इसके बावजूद, पैर में चोट होने के बाद भी मोहम्मद जुनैद स्थानीय सिख लंगरों के सहयोग से दिन-रात प्रदर्शनकारियों तक भोजन पहुंचाने का काम करते रहे।
पार्टी ने आरोप लगाया कि सरकार मानवीय सहायता देने वालों की जांच में पूरी ताकत लगा रही है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े गंभीर मामलों में विफल रही है। संपादकीय में कहा गया कि पहलगाम आतंकी हमले में 27 पर्यटकों की हत्या करने वाले आतंकियों का अब तक पता नहीं चल पाया और पुलवामा हमले में 40 जवानों की जान लेने वाले आरडीएक्स का स्रोत भी सामने नहीं आ सका। इसके बावजूद पूरी सरकारी मशीनरी इस बात की जांच में लगी है कि जुनैद के भोजन अभियान के लिए पैसा कहां से आया, सिर्फ इसलिए क्योंकि वे दाढ़ी और टोपी पहनते हैं।
संपादकीय में यह भी आरोप लगाया गया कि प्रशासन इस बात से हैरान है कि समाज के लोगों ने मिलकर इतने बड़े स्तर पर राहत अभियान कैसे चलाया, इसलिए जुनैद और उनके परिवार को परेशान किया जा रहा है।
समना संपादकीय में शिवसेना (यूबीटी) ने सरकार से यह भी मांग की कि जिस तरह जुनैद के अभियान की फंडिंग की जांच हो रही है, उसी तरह सरकार और राजनीतिक दलों की आर्थिक व्यवस्था की भी पूरी पारदर्शिता होनी चाहिए। साथ ही भाजपा के चुनावी फंड की भी आधिकारिक जांच कराने की मांग उठाई।
संपादकीय में जंतर-मंतर आंदोलन को किसी असफल विरोध प्रदर्शन के बजाय ‘तानाशाही के खिलाफ युवाओं का विशाल और जीवंत महोत्सव’ बताया गया। पार्टी ने कहा कि पुलिस की लाठी, पैलेट गन, नुकीले डंडों और आंसू गैस का सामना करने के बावजूद युवाओं के चेहरे पर डर या दर्द नहीं था। संपादकीय में यह भी कहा गया कि यदि आंदोलन खत्म होने के बाद ‘कॉकरोच’ एक बैठक में साथ बैठकर चर्चा करते हैं, तो भाजपा समर्थकों को इससे आहत होने की जरूरत नहीं है।
समना संपादकीय में शिवसेना (यूबीटी) ने पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं से अपील की कि वे मोहम्मद जुनैद, शादाब सैफी और अन्य जमीनी स्तर के सामाजिक कार्यकर्ताओं के खिलाफ कथित सरकारी कार्रवाई के विरोध में एकजुट होकर आवाज उठाएं।

