Wednesday, July 29, 2026
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सावन में मनाए जाने वाले पर्वों का आधार सिर्फ आस्था नहीं बल्कि विज्ञान भी; जानिए इसके वैज्ञानिक महत्व

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नई दिल्ली, 29 जुलाई (आईएएनएस)। भारत में सावन का महीना केवल पूजा-पाठ और धार्मिक आस्था का समय नहीं है बल्कि इसके हर पर्व और परंपरा के पीछे स्वास्थ्य, पर्यावरण, मनोविज्ञान और सामाजिक जीवन से जुड़ा गहरा वैज्ञानिक आधार भी छिपा हुआ है। सावन के सभी सोमवार, नाग पंचमी, हरियाली तीज और रक्षाबंधन जैसे प्रमुख पर्व न केवल आध्यात्मिक महत्व रखते हैं बल्कि मानव जीवन और प्रकृति के बीच संतुलन बनाए रखने का संदेश भी देते हैं।

सावन के सोमवार का व्रत भगवान शिव की आराधना के लिए रखा जाता है। वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो वर्षा ऋतु में सूर्य का प्रकाश कम मिलने के कारण शरीर की पाचन शक्ति (मेटाबॉलिज्म) कमजोर हो जाती है। ऐसे में उपवास रखने से पाचन तंत्र को आराम मिलता है और शरीर को प्राकृतिक रूप से डिटॉक्स होने का अवसर मिलता है। डर्मेटोलॉजिस्ट की रिपोर्टों की बात करें तो शरीर जितना डिटॉक्स होता है, त्वचा में उतना ही निखार आती है।

बता दें कि मेटाबॉलिज्म शरीर के अंदर होने वाली वह रासायनिक प्रक्रिया है, जो खाए गए भोजन और पानी को ऊर्जा में बदलती है। यह प्रक्रिया सांस लेने, खाना पचाने, खून का बहाव रखने और नई कोशिकाएं बनाने जैसे सभी जरूरी काम करने के लिए शरीर को शक्ति देती है।

आयुर्वेद भी इस मौसम में विशेष खानपान की सलाह देता है। सावन में हरी पत्तेदार सब्जियां, प्याज, लहसुन और मांसाहारी भोजन से परहेज करने की परंपरा है। इसका कारण यह माना जाता है कि बारिश और नमी के कारण इन खाद्य पदार्थों में बैक्टीरिया और कीड़े जल्दी पनप सकते हैं, जिससे संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है।

इसी तरह भगवान शिव के शिवलिंग पर जल या गंगाजल चढ़ाने और औषधीय गुणों से भरपूर बेलपत्र अर्पित करने की परंपरा भी स्वास्थ्य से जुड़ी मानी जाती है। माना जाता है कि बेलपत्र के औषधीय गुण मानसून में होने वाले संक्रमण और पेट संबंधी समस्याओं से राहत देने में सहायक होते हैं।

इस मौसम में घास-फूस खाने वाले पशु कई बार अनजाने में ऐसे कीड़े-मकोड़े खा लेते हैं, जिससे उनका दूध स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है और आयुर्वेद के अनुसार सावन में सीधे दूध का सेवन टालने की सलाह दी जाती थी और इसी कारण अतिरिक्त दूध को स्वास्थ्य हित में उपभोग करने के बजाय भगवान शिव को अर्पित करने की परंपरा बनाई गई।

सावन में मनाई जाने वाली नाग पंचमी केवल सांपों की पूजा का पर्व नहीं है बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी देती है। वैज्ञानिक दृष्टि से वर्षा ऋतु में बारिश के कारण सांप अपने बिलों से बाहर निकल आते हैं। इसी समय खेतों में चूहों और कीट-पतंगों की संख्या भी बढ़ जाती है, जो फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं। सांप इन जीवों को नियंत्रित कर प्राकृतिक संतुलन बनाए रखते हैं। इसलिए नाग पूजा का मूल संदेश प्रकृति के हर जीव के महत्व को समझना और उनके साथ सह-अस्तित्व की भावना विकसित करना है।

हरियाली तीज सावन की हरियाली और प्रकृति के सौंदर्य का उत्सव है। मानसून के दौरान चारों ओर फैली हरियाली और ठंडी हवाएं मानव मस्तिष्क पर सकारात्मक प्रभाव डालती हैं।

उत्तराखंड में सावन माह की शुरुआत हरेला पर्व से होती है, जिसमें पेड़-पौधों और हरियाली की पूजा कर नए पौधे रोपे जाते हैं। इसके पीछे का वैज्ञानिक तर्क यह है कि त्योहार से 9-10 दिन पहले घरों में सात प्रकार के बीज (जैसे जौ, गेहूं, मक्का, धान, उड़द) बोए जाते हैं। इन बीजों के उगने वाले हरे-भरे अंकुरों से आने वाले साल की फसल और समृद्धि का अनुमान लगाया जाता है। इस पर्व में पेड़ लगाने का महत्व यह है कि यह बड़े पैमाने पर पौधरोपण अभियान को बढ़ावा देता है ताकि पहाड़ की पर्यावरण व्यवस्था सुरक्षित रहे।

विशेषज्ञों के अनुसार, हरा वातावरण मस्तिष्क में सेरोटोनिन जैसे ‘हैप्पी हार्मोन’ के स्तर को बढ़ाने में मदद करता है। इससे तनाव कम होता है और मानसिक शांति मिलती है। वहीं, झूला झूलने, पारंपरिक गीत गाने और सामूहिक रूप से उत्सव मनाने की परंपरा महिलाओं के सामाजिक मेल-मिलाप और मानसिक प्रसन्नता का महत्वपूर्ण माध्यम बनती है।

सावन पूर्णिमा पर मनाया जाने वाला रक्षाबंधन भाई-बहन के स्नेह का प्रतीक माना जाता है लेकिन इसका महत्व केवल पारिवारिक रिश्तों तक सीमित नहीं है। यह पर्व समाज में सुरक्षा, परस्पर दायित्व, विश्वास और भाईचारे की भावना को मजबूत करता है। रक्षाबंधन लोगों को एक-दूसरे के प्रति जिम्मेदारी निभाने और सामाजिक सौहार्द बनाए रखने का संदेश देता है।