Saturday, August 1, 2026
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‘वंदे मातरम’ को कानूनी रूप से अनिवार्य बनाना धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला: एआईएमपीएलबी

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नई दिल्ली, 31 जुलाई (आईएएनएस)। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) ने शुक्रवार को संसद में उस संशोधन विधेयक पारित होने पर चिंता जताई, जिसके तहत ‘वंदे मातरम’ का कथित अपमान दंडनीय अपराध बन जाएगा।

एआईएमपीएलबी ने इस कदम को ‘देश की संवैधानिक, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक भावना के खिलाफ’ बताया।

बोर्ड के अनुसार, कानून के माध्यम से सभी नागरिकों पर किसी खास धार्मिक अवधारणा या विश्वास को थोपना भारत के संविधान की मूल भावना के विपरीत है।

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के प्रवक्ता एसक्यूआर इलियास ने कहा कि कानूनी दबाव के जरिए सभी वर्गों और धार्मिक समुदायों के लिए ‘वंदे मातरम’ को अनिवार्य बनाने की कोई भी कोशिश आपत्तिजनक है और नागरिकों की धार्मिक स्वतंत्रता पर गंभीर हमला है।

इलियास ने जोर देकर कहा कि मातृभूमि के प्रति प्रेम और मातृभूमि की पूजा दो बिल्कुल अलग-अलग अवधारणाएं हैं।

उन्होंने कहा कि भारत के संविधान का अनुच्छेद 25 हर नागरिक को अपने धर्म को मानने, उसका पालन करने और उसका अनुसरण करने की स्वतंत्रता की गारंटी देता है, जबकि अनुच्छेद 19 अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है।

उन्होंने कहा कि इन संवैधानिक सुरक्षा उपायों का स्पष्ट अर्थ है कि किसी भी नागरिक को उसकी धार्मिक मान्यताओं और अंतरात्मा के खिलाफ किसी गीत, नारे, विचारधारा या प्रतीक को अपनाने या उसमें भाग लेने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है।

उन्होंने एक बयान में कहा कि मुसलमान अपने देश से बहुत प्यार करते हैं और अपनी मातृभूमि के प्रति प्रेम को अपनी नागरिक और नैतिक जिम्मेदारी का हिस्सा मानते हैं, लेकिन वे देश को देवता या देवी नहीं मान सकते।

उन्होंने केंद्र सरकार से अपील की कि वह ऐसे कदम न उठाए जो संवेदनशील हों और लोगों को बांटने वाले हों। इसके बजाय, सरकार को देश की असली समस्याओं – जैसे बेरोजगारी, महंगाई, गरीबी, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, आर्थिक असमानता और सामाजिक अन्याय – को हल करने पर ध्यान देना चाहिए।

इलियास ने कहा कि एक मजबूत और एकजुट भारत तभी बन सकता है जब हर नागरिक को समान सम्मान, न्याय और आजादी मिले, जहां किसी की देशभक्ति को उसकी धार्मिक मान्यताओं के नजरिए से न परखा जाए।