Saturday, August 1, 2026
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यादों में मालवीय : उमाकांत मालवीय ने नवगीत को कैसे दिलाई नई पहचान

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नई दिल्ली, 1 अगस्त (आईएएनएस)। प्रसिद्ध कविता ‘एक चाय की चुस्की’ के रचयिता उमाकांत मालवीय का जन्म 2 अगस्त 1931 को महाराष्ट्र के मुंबई शहर में हुआ था। जीवन के शुरुआती दौर में ही पिता का साया सिर से उठ जाने के कारण उन्हें बहुत कठोर संघर्ष करना पड़ा। पिता के निधन के पश्चात उनका परिवार इलाहाबाद (वर्तमान प्रयागराज) आ गया।

उमाकांत मालवीय ने प्रयाग विश्वविद्यालय से अपनी उच्च शिक्षा पूरी की और महालेखाकार कार्यालय में अपनी सेवाएं देनी आरंभ कीं। साठ के दशक में जब ‘नई कविता’ का वर्चस्व स्थापित हो रहा था और साहित्य जगत में यह माना जाने लगा था कि पारंपरिक गीतों में आधुनिक युग की जटिल विसंगतियों को बयां करने की क्षमता नहीं है, तब उमाकांत मालवीय ने एक शांत लेकिन अत्यंत प्रभावशाली रचनात्मक क्रांति का सूत्रपात किया।

नई कविता और नवलेखन की सुप्रसिद्ध संस्था ‘परिमल’ से जुड़कर उन्होंने अपनी वैचारिक और रचनात्मक बौद्धिकता को निरंतर मांजा।

जहां नई कविता के पैरोकार गीतों को प्रायः कमतर आंकते थे, वहीं उमाकांत मालवीय ने सुदामा पांडेय ‘धूमिल’ जैसे प्रखर कवियों से बनारस में डटकर बौद्धिक बहसें कीं। उन्होंने कविता के वाचिक पक्ष को केंद्र में रखकर नवगीत को नई कविता के समकक्ष ला खड़ा किया। उनके गीतों में केवल कोरी भावुकता नहीं थी, बल्कि जीवन, राजनीति, नैतिकता, फरेब और समाज की क्रूर विसंगतियों पर एक तीखी समीक्षा (क्रिटीक) मौजूद थी। उनके गीतों की पंक्तियां, “झंडे रह जाएंगे, आदमी नहीं…” मनुष्य की नश्वरता और उसके कर्मों या विचारों के प्रभाव को दर्शाती है। इसी विशिष्ट ऐतिहासिक योगदान और प्रयोगवाद एवं गीत-विधा के अद्भुत समन्वय के कारण प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. शंभुनाथ सिंह उन्हें आदरपूर्वक ‘नवगीत का भागीरथ’ कहा करते थे।

उमाकांत मालवीय का जीवन एक सघन अनुभूतियों वाली कविता की तरह था। वे कवि-सम्मेलनों के अत्यंत संजीदा संचालक थे और ट्रेड यूनियन की गतिविधियों ने उन्हें आजीवन जुझारू बनाए रखा। उनके अंतर्मन का वैराग्य और जीवन का सहज दर्शन उनके एक प्रसिद्ध पंक्ति (“एक चाय की चुस्की, एक कहकहा, अपना तो इतना सामान ही रहा।”) में पूरी प्रामाणिकता के साथ झलकता है।

11 नवंबर 1982 को उमाकांत मालवीय ने इस दुनिया को अलविदा कर दिया। उनके परिवार की दूसरी पीढ़ी में यश मालवीय और अंशु मालवीय आज भी इस साहित्यिक विरासत को अविरल रूप से आगे बढ़ा रहे हैं।