नई दिल्ली, 1 अगस्त (आईएएनएस)। बांग्लादेशी मूल की चर्चित लेखिका तसलीमा नसरीन शनिवार को लगभग दो दशक बाद पहली बार सार्वजनिक रूप से कोलकाता पहुंचीं। उनकी यह वापसी कई मायनों में उनके चर्चित उपन्यास ‘फेरा (द रिटर्न)’ की याद दिलाती है। हालांकि दोनों यात्राओं की परिस्थितियां अलग हैं, लेकिन विस्थापन, स्मृतियों और अपनेपन की तलाश का साझा भाव दोनों में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
‘फेरा’ की नायिका कल्याणी पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से भारत आने वाली एक हिंदू महिला है, जो वर्षों बाद अपने जन्मस्थान लौटती है। उपन्यास में विभाजन की त्रासदी, महिलाओं की चुनौतियों और पहचान के संकट को प्रमुखता से उकेरा गया है। इसी तरह तसलीमा नसरीन की वापसी भी केवल किसी शहर में लौटना नहीं, बल्कि उस स्थान, भाषा, संस्कृति और यादों से दोबारा जुड़ने का प्रतीक मानी जा रही है।
तसलीमा नसरीन की कोलकाता वापसी की उम्मीद मार्च 2025 में तब जगी थी, जब पश्चिम बंगाल भाजपा अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद समीक भट्टाचार्य ने संसद के उच्च सदन में उन्हें कोलकाता लौटने की अनुमति देने की मांग उठाई थी।
यह मांग उस विवाद के बाद सामने आई थी, जब तत्कालीन तृणमूल कांग्रेस सरकार पर उनकी चर्चित पुस्तक ‘लज्जा’ पर आधारित नाटक के मंचन को रोकने का आरोप लगा था। वर्ष 1993 में प्रकाशित ‘लज्जा’ में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद बांग्लादेश में एक हिंदू परिवार पर हुए अत्याचारों का चित्रण किया गया था, जिसके चलते उन्हें अपने देश में तीव्र विरोध का सामना करना पड़ा।
धार्मिक कट्टरता की आलोचना, महिलाओं के अधिकारों की मुखर वकालत और धर्म के नाम पर होने वाले भेदभाव के विरोध के कारण तसलीमा नसरीन को लगातार धमकियां मिलीं। कट्टरपंथियों ने उनके सिर पर इनाम घोषित कर दिया, जिसके बाद उन्हें 1994 में बांग्लादेश छोड़ना पड़ा और तब से वह निर्वासन का जीवन जी रही हैं।
वर्ष 2004 में उन्होंने कोलकाता को अपना ठिकाना बनाया, लेकिन 2007 में उनकी आत्मकथात्मक पुस्तक ‘द्विखंडित’ को लेकर हुए उग्र विरोध प्रदर्शनों के बाद तत्कालीन वाम मोर्चा सरकार ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए उन्हें राज्य छोड़ने पर मजबूर कर दिया।
हालांकि उनकी वापसी पर कभी कोई औपचारिक प्रतिबंध नहीं लगाया गया, लेकिन तृणमूल कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में भी उनके लिए कोलकाता के दरवाजे प्रभावी रूप से बंद ही रहे। इसके बाद उन्होंने नई दिल्ली को अपना निवास बना लिया।
तसलीमा नसरीन का जन्म कोलकाता में नहीं हुआ, लेकिन वह इस शहर को हमेशा अपनी ‘सिटी ऑफ जॉय’ मानती रही हैं। उनके लिए यह शहर भाषा, साहित्य, संस्कृति और आत्मीय संबंधों का केंद्र रहा है, जहां उन्होंने अपने लिए एक दूसरा घर बनाया था।
‘फेरा’ की नायिका कल्याणी की तरह तसलीमा नसरीन की वापसी भी इस सवाल को सामने लाती है कि क्या स्मृतियों में बसे घर को वास्तव में दोबारा पाया जा सकता है। उपन्यास में कल्याणी जब वर्षों बाद अपने जन्मस्थान लौटती है, तो उसे एहसास होता है कि समय ने लोगों, रिश्तों और परिवेश को बदल दिया है और उसकी यादों का घर अब पहले जैसा नहीं रहा।
इसी तरह तसलीमा नसरीन की कोलकाता वापसी को उनके निष्कासन के प्रतीकात्मक अंत और उस शहर में लौटने के अधिकार की देर से मिली स्वीकार्यता के रूप में देखा जा रहा है, जिसे उन्होंने कभी अपनी इच्छा से नहीं छोड़ा था।
तसलीमा नसरीन ने अपनी इस यात्रा को भावनात्मक ‘घर वापसी’ बताया है और कोलकाता के दरवाजे फिर से खुलने पर आभार व्यक्त किया है। हालांकि यह देखना बाकी है कि यह स्वागत केवल एक औपचारिक अवसर तक सीमित रहता है या भविष्य में भी उनके लिए कोलकाता का दरवाजा हमेशा खुला रहेगा।

