Friday, August 7, 2026
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पश्चिम बंगाल में मस्जिदों से लाउडस्पीकर हटाने पर सियासत, इमाम बोले- बनाया जा रहा दबाव

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कोलकाता, 6 अगस्त (आईएएनएस)। पश्चिम बंगाल में मस्जिदों से लाउडस्पीकर हटाने को लेकर शुरू हुआ विवाद अब राजनीतिक और सामाजिक बहस का विषय बनता जा रहा है। इस मुद्दे पर कोलकाता की नखोदा मस्जिद के इमाम मौलाना मोहम्मद शफीकुल वजमी और भाजपा विधायक सौरव सिकदर ने प्रतिक्रिया दी।

आईएएनएस से बातचीत में नखोदा मस्जिद के इमाम मौलाना मोहम्मद शफीकुल वजमी ने आरोप लगाया कि राज्य के विभिन्न इलाकों में पुलिस मस्जिदों के इमामों और मस्जिद कमेटियों के जिम्मेदारों को बुलाकर लाउडस्पीकर हटाने के लिए दबाव बना रही है। यदि किसी प्रकार का सरकारी आदेश जारी हुआ है तो संबंधित अधिकारियों को लिखित नोटिस देना चाहिए। केवल मौखिक रूप से बुलाकर धमकाना न तो कानूनी है और न ही लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनुरूप।

उन्होंने कहा कि ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित करने की जिम्मेदारी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की है और उसी ने विभिन्न क्षेत्रों के लिए ध्वनि सीमा तय की है। औद्योगिक क्षेत्रों में 75 से 80 डेसीबल, व्यावसायिक क्षेत्रों में 70 से 75 डेसीबल, आवासीय क्षेत्रों में 65 से 70 डेसीबल और साइलेंस जोन में 45 से 50 डेसीबल तक ध्वनि की अनुमति है। कहीं भी ऐसा नियम नहीं है कि सभी मस्जिदों से लाउडस्पीकर पूरी तरह हटा दिए जाएं।

उन्होंने दावा किया कि राज्य की मस्जिदों में इमाम और मुअज्जिन प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की गाइडलाइन और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप ही अजान दे रहे हैं। यदि कहीं निर्धारित सीमा से अधिक ध्वनि का उपयोग हो रहा है तो संबंधित मस्जिद को नोटिस देकर आवाज कम करने का निर्देश दिया जाना चाहिए, न कि सीधे लाउडस्पीकर हटाने या तोड़ने की धमकी दी जाए।

मौलाना ने मुख्यमंत्री से इस पूरे मामले में हस्तक्षेप करने की अपील करते हुए कहा कि सरकार को सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी भी समुदाय के लोगों को अनावश्यक परेशानी न हो। साथ ही, उन्होंने राज्य के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) से भी मामले की जांच कर उचित कार्रवाई करने की मांग की।

वहीं, इस विवाद पर भाजपा विधायक सौरव सिकदर ने कहा कि पश्चिम बंगाल में किसी धर्म का नहीं बल्कि कानून का शासन चलता है। चाहे किसी भी धर्म या समुदाय का व्यक्ति हो, सभी को कानून और नियमों का पालन करना होगा। यदि किसी को प्रशासनिक कार्रवाई पर आपत्ति है तो वह कानूनी प्रक्रिया के तहत अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है। किसी धर्मगुरु द्वारा विरोध जताने से कानून नहीं बदलता और केवल धार्मिक आधार पर दिए गए बयानों का कोई विशेष महत्व नहीं है। सभी को निर्धारित नियमों के अनुसार ही आचरण करना चाहिए।