नई दिल्ली, 9 अगस्त (आईएएनएस)। 1930 के दशक में जब फिल्मों में संगीत का क्षेत्र पूरी तरह पुरुषों के वर्चस्व में था, तब सरस्वती देवी ने भारतीय फिल्म संगीत की नींव रखने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई थी। सरस्वती देवी को भारतीय सिनेमा की पहली महिला संगीतकार थीं।
सरस्वती देवी का जन्म 1912 में एक पारसी परिवार में हुआ था। सरस्वती देवी का असली नाम खोरशेद मिनोचर-होमजी था। सरस्वती देवी को बचपन से संगीत से प्रेम था। यह देखते हुए पिता ने विष्णु नारायण भटखंडे के तहत हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा दिलाई। इसके बाद उन्होंने लखनऊ के मैरिस कॉलेज से संगीत की शिक्षा हासिल की।
9 अगस्त 1980 को दुनिया से अलविदा कहने वाली सरस्वती देवी ने 1930 और 40 के दशक में कई लोकप्रिय हिंदी फिल्मों को संगीत दिया था। वह बॉम्बे टॉकीज की ‘अच्युत कन्या’ में अपने म्यूजिक स्कोर से लेकर ‘मैं बन के चिरिया बोलू रे’ जैसे प्रसिद्ध गीतों के लिए जानी जाती हैं।
सरस्वती देवी ने 1920 में अपने गायन करियर की शुरुआत ‘ऑल इंडिया रेडियो’ मुंबई से की थी। उन्होंने अपनी बहन मानेक के साथ नियमित रूप से संगीत प्रस्तुतियां देती थीं। होमजी सिस्टर्स के नाम से जाना जाने वाला यह कार्यक्रम काफी लोकप्रिय था। सरस्वती देवी सितार, मैंडोलिन और दिलरूबा भी बजाती थीं।
इसी दौरान सरस्वती देवी की बॉम्बे टाकीज से संस्थापक मुलाकात हिमांशु राय से हुई, जो शास्त्रीय संगीत में प्रशिक्षित किसी व्यक्ति को अपनी फिल्मों के लिए ढूढ़ रहे थे। राय ने सरस्वती देवी को फिल्मों में काम करने का न्योता दिया। उस समय महिलाओं का संगीत और फिल्मों में काम करने को बुरा माना जाता था। जो महिलाएं फिल्मों में काम करती थीं, उनके परिवार को भी समाज में अच्छा नहीं माना जाता था।
साल 1935 में सरस्वती देवी को पहली बार बॉम्बे टॉकीज स्टूडियो की फिल्म में काम करने का मौका मिला। फिल्म ‘जवानी की हवा’ पहली फिल्म थी, जिसमें सरस्वती देवी ने काम किया। जवानी की हवा के बाद उनकी पहली हिट फिल्म अच्युत कन्या (1936) आई। साल 1936 में उन्होंने फिल्म ‘जन्मभूमि’ में संगीत दिया था। यह फिल्म भारतीय स्वतंत्रता अभियान के तहत रिलीज की गई थी। देवी ने हिंदी सिनेमा के पहले देशभक्ति गीत ‘जय जय जननी जन्मभूमि’ को तैयार किया, जिसे जे.एस. कश्यप ने लिखा था।
सरस्वती देवी और उनकी बहन के काम करने का पारसी समुदाय ने भी बहुत विरोध किया था। इसके बाद उनका नाम छिपाकर काम करने की बात तय की हुई। हिमांशु राय ने होमजी का नाम सरस्वती देवी रख दिया। उनकी बहन जो कंपनी में अभिनय करती थी, उन्हें चंद्रप्रभा नाम दिया।
सरस्वती देवी ने लगातार 1961 तक फिल्मों के लिए संगीत तैयार किया। सरस्वती देवी को गाने की रिहर्सल करने के लिए घंटों बिताने के लिए जाना जाता था। सरस्वती देवी बेहतर प्रस्तुति के लिए गैर-गायक अभिनेताओं और अभिनेत्रियों को बेहतरीन तरीके से गाने के लिए प्रशिक्षित करती थीं और देर तक रिहर्सल कराती थीं ताकि बेहतर प्रस्तुति दी जा सके।
अच्युत कन्या के लोकप्रिय गीत ‘बन के चिड़िया’ से लेकर कई फिल्मों में काम किया। उन्होंने मीरा के जीवन पर सून पेड़ से सितार (कंगन, 1939), मन बावन लो सावन जाया रे (बंधन, 1940), झूले के संग झूलो (झूला, 1941) और लोकप्रिय गीत चल चल रे नौजवान (बंधन) जैसे को गीतों के लिए संगीत दिया। 1939 में सरस्वती ने नवजीवन फिल्म के लिए प्रसिद्ध गायक और अभिनेता हंसा वाडकर की आवाज में चार गाने भी रिकॉर्ड किए। 1941 तक सरस्वती ने बॉम्बे टाकीज के साथ काम किया। हिमांशु राय की मृत्यु के बाद मिनर्वा मूवीटोन के लिए संगीत रचना शुरू की। इसके बाद स्वतंत्र संगीतकार के तौर पर काम किया।
सरस्वती देवी ने कभी शादी नहीं की और अपने अपार्टमेंट में अकेली रहती थीं। एक दिन वह बस से गिर गईं और उनकी कूल्हे की हड्डी टूट गई। फिल्म जगत की कोई भी हस्ती उनकी मदद के लिए आगे नहीं आई। सरस्वती देवी का 9 अगस्त 1980 को 68 वर्ष की आयु में निधन हो गया।

