नई दिल्ली, 12 अगस्त (आईएएनएस)। भारत की सबसे बड़ी सूचीबद्ध कंपनियों के शीर्ष नेतृत्व पदों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व काफी कम है। देश की शीर्ष 500 सूचीबद्ध कंपनियों में से केवल नौ महिलाएं मुख्य कार्यकारी अधिकारी और 25 महिलाएं प्रबंध निदेशक के पदों पर कार्यरत हैं।
लोकसभा में एक प्रश्न का उत्तर देते हुए कॉरपोरेट मामलों के राज्य मंत्री हर्ष मल्होत्रा ने कहा कि एमसीए21 डेटाबेस में उपलब्ध जानकारी के आधार पर कारोबार के हिसाब से शीर्ष 500 सूचीबद्ध कंपनियों में केवल नौ महिला मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) और 25 महिला प्रबंध निदेशक (एमडी) हैं।
आंकड़ों से पता चला कि इन कंपनियों में कुल मिलाकर 860 महिला निदेशक और बोर्ड सदस्य थीं।
इसमें 738 निदेशक, 67 पूर्णकालिक निदेशक, 25 प्रबंध निदेशक, 18 अतिरिक्त निदेशक और 12 मनोनीत निदेशक शामिल थे। कंपनियों ने 22 महिला मुख्य वित्तीय अधिकारियों (सीएफओ) की भी जानकारी दी।
शीर्ष पदों पर प्रतिनिधित्व सीमित होने के बावजूद व्यापक कॉर्पोरेट पारिस्थितिकी तंत्र में महिलाओं की भागीदारी काफी अधिक है।
मंत्रालय के अनुसार, देश भर में कुल 39 लाख निदेशकों में से लगभग 11 लाख महिलाएं वर्तमान में सक्रिय कंपनियों से निदेशक के रूप में जुड़ी हुई हैं।
भारत में वर्तमान में लगभग 2.14 मिलियन सक्रिय कंपनियां और 506,000 से अधिक सक्रिय सीमित देयता भागीदारी (एलएलपी) हैं, जबकि पिछले दशक में लगभग 1.55 मिलियन कंपनियां पंजीकृत हुई हैं।
सरकार ने कहा कि उसने उन बाधाओं का कोई विशिष्ट आकलन नहीं किया है, जो महिला निदेशकों को वरिष्ठ नेतृत्व भूमिकाओं में आगे बढ़ने से रोक सकती हैं।
मल्होत्रा ने अपने लिखित जवाब में कहा कि मंत्रालय ने कॉर्पोरेट जगत में महिला निदेशकों की उन्नति को प्रभावित करने वाली चुनौतियों का अलग से अध्ययन नहीं किया है।
मंत्री ने यह भी संकेत दिया कि महिला निदेशकों की नियुक्ति को नियंत्रित करने वाले मौजूदा कानूनी ढांचे का हवाला देते हुए वर्तमान में कोई नए नीतिगत उपाय, प्रोत्साहन या विविधता लक्ष्य विचाराधीन नहीं हैं।
उन्होंने आगे कहा कि कंपनी अधिनियम, 2013 में ‘चेयरपर्सन’ या ‘चीफ टेक्नोलॉजी ऑफिसर’ के पदों को परिभाषित नहीं किया गया है और इसलिए मंत्रालय इन पदों से संबंधित आंकड़े नहीं रखता है।
एमसीए ने उन कंपनियों के खिलाफ की गई प्रवर्तन कार्रवाई का भी खुलासा किया, जो महिला निदेशकों की नियुक्ति की आवश्यकता का पालन करने में विफल रहीं।
2021-22 और 2025-26 के बीच, कंपनी रजिस्ट्रारों ने ऐसे उल्लंघनों के लिए 50 न्यायनिर्णय आदेश पारित किए और कुल मिलाकर 71.01 लाख रुपए का जुर्माना लगाया।
न्याय निर्णय आदेशों की संख्या 2021-22 में दो से बढ़कर 2022-23 में 10 हो गई और 2023-24 में 19 के शिखर पर पहुंच गई, जिसके बाद यह 2024-25 में घटकर 11 और 2025-26 में आठ हो गई।

