Friday, August 14, 2026
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टॉयलेट एक ‘सच्ची’ कथा : सफाईकर्मियों को समानता दिलाने वाले संघर्ष के नायक, समाज की भी बदली सोच

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नई दिल्ली, 14 अगस्त (आईएएनएस)। 15 अगस्त को देश आजादी का जश्न मना रहा होता है और उसी दिन एक ऐसे व्यक्ति की सांसें थम गई थी, जिसने अपनी जिंदगी उन लोगों की आजादी के लिए लगा दी, जिन्हें समाज ने बराबरी से दूर रखा था। यह कहानी है बिंदेश्वर पाठक की, एक ऐसे व्यक्ति की, जिसने शौचालय को सिर्फ स्वच्छता का साधन नहीं, बल्कि इंसान की गरिमा, समानता और सामाजिक बदलाव का हथियार बना दिया।

उनका नाम सामने आते ही ‘सुलभ इंटरनेशनल’ याद आता है। लेकिन, उनकी असली पहचान सिर्फ एक संस्था के संस्थापक की नहीं थी। वे उस सामाजिक सोच को बदलने निकले थे, जिसमें किसी इंसान का जन्म ही उसके पेशे और सामाजिक हैसियत को तय कर देता था। बिहार के वैशाली जिले के रामपुर बघेल गांव में जन्मे पाठक पर उनकी मां योगमाया देवी का गहरा प्रभाव था। उनकी मां जरूरतमंदों की मदद करने में कभी पीछे नहीं हटती थीं। उन्होंने मां से बिना किसी अपेक्षा के दूसरों की मदद करना सीखा और यही सीख आगे चलकर उनके जीवन का मिशन बन गई।

पटना के बीएन कॉलेज से समाजशास्त्र की पढ़ाई के बाद वे गांधी शताब्दी समिति से जुड़े। यहीं से उनका सामना उस भारत से हुआ, जहां हाथ से मैला ढोने वाले लोग सामाजिक भेदभाव और अमानवीय परिस्थितियों में जीवन बिताने को मजबूर थे। महात्मा गांधी के विचारों ने उनके भीतर चल रहे सवालों को दिशा दी। एक घटना ने उनके जीवन की राह ही बदल दी। बचपन में उन्होंने देखा था कि सफाई करने वाली महिलाओं के साथ किस तरह भेदभाव होता है। बाद में बेतिया में उन्होंने एक ऐसी घटना देखी, जिसमें एक युवक को सिर्फ इसलिए मदद से वंचित कर दिया गया क्योंकि उसे अछूत माना गया। यहीं से उनके जीवन की दिशा बदल गई। उन्होंने यह तय कर लिया कि स्वच्छता के साथ-साथ उन लोगों की गरिमा के लिए भी काम करना है, जिन्हें समाज ने सबसे नीचे धकेल दिया था।

साल था 1968, जब उन्होंने सूखे शौचालयों के विकल्प पर काम शुरू किया और दो गड्ढों वाले पोर-फ्लश शौचालय की तकनीक विकसित की। इसका मकसद एक ऐसी व्यवस्था को तैयार करना था, जिसमें मानव मल को हाथ से साफ करने की जरूरत ही न पड़े। पाठक का यही विचार आगे चलकर सुलभ आंदोलन की नींव बना। हालांकि, यह रास्ता आसान नहीं था। आर्थिक संकट के कारण उन्होंने अपनी जमीन का हिस्सा और पत्नी के गहने तक बेच दिए। सरकारी दफ्तरों में फाइलें अटकती रहीं, लेकिन वह नहीं रुके। 1973 में आरा नगरपालिका ने उन्हें महज 500 रुपए में दो शौचालय बनाने का मौका दिया। यही छोटा-सा प्रयोग आगे चलकर बड़े बदलाव का मॉडल बना।

1974 में बिहार सरकार ने स्थानीय निकायों को सुलभ की मदद से बाल्टी शौचालयों को दो-पिट वाले फ्लश शौचालयों में बदलने की सलाह दी। इसी दौर में ‘पे एंड यूज’ सार्वजनिक शौचालय की अवधारणा भी सामने आई। जो कभी असंभव सा लगता था, वह धीरे-धीरे पूरे देश में फैलने लगा। उनका आंदोलन सिर्फ शौचालय बनाने तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने सफाईकर्मियों के पुनर्वास, शिक्षा और कौशल विकास पर भी जोर दिया। वे चाहते थे कि किसी बच्चे का भविष्य उसके माता-पिता के पेशे से तय न हो।

पाठक ने सफाईकर्मियों के साथ किए जा रहे सामाजिक भेदभाव के खिलाफ मोर्चा खोला। उनके लिए मंदिरों में प्रवेश से लेकर सम्मान के साथ जीवन जीने के अधिकार तक के लिए वे संघर्ष करते रहे। बाद में वृंदावन की एकल नारियों के जीवन में गरिमा लौटाने के लिए भी उन्होंने काम किया।

साल 1991 में उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उनके काम को पहचान मिली। उनके प्रयासों ने स्वच्छता को स्वास्थ्य से आगे ले जाकर मानवाधिकार, समानता और सम्मान के सवाल से जोड़ दिया। देश में आज जब स्वच्छता की बात होती है, स्कूलों में शौचालयों को बच्चों की शिक्षा से जोड़ा जाता है और खुले में शौच से मुक्ति को विकास का हिस्सा माना जाता है, तब बिंदेश्वर पाठक की कहानी महत्वपूर्ण हो जाती है।