Friday, August 21, 2026
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‘फर्जी राष्ट्रवाद’ के जरिए असली मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश: जगत सिंह नेगी

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शिमला, 21 अगस्त (आईएएनएस)। हिमाचल प्रदेश विधानसभा में ‘वंदे मातरम’ को लेकर हुए हंगामे के बाद सियासी बयानबाजी तेज हो गई है। प्रदेश के राजस्व मंत्री जगत सिंह नेगी ने भाजपा पर आरोप लगाया कि ‘वंदे मातरम’ के मुद्दे को लेकर किया गया हंगामा पहले से तय रणनीति का हिस्सा था। उन्होंने कहा कि भाजपा ‘फर्जी राष्ट्रवाद’ को आगे करके देश और प्रदेश के ज्वलंत मुद्दों से जनता का ध्यान भटकाने की कोशिश कर रही है।

जगत सिंह नेगी ने कहा कि विधानसभा के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ कि सदन के पहले दिन की पारंपरिक कार्यवाही को बाधित किया गया। सदन के पहले दिन उन पूर्व या वर्तमान सदस्यों के लिए शोक प्रस्ताव यानी ऑबिच्युरी पेश करने की परंपरा रही है, जिनका पिछली बैठक और मौजूदा बैठक के बीच निधन हुआ हो। इस बार भी दो दिवंगत सदस्यों के लिए शोक प्रस्ताव रखा जाना था, लेकिन भाजपा के हंगामे के कारण यह परंपरा प्रभावित हुई।

नेगी ने सवाल उठाया कि आखिर ऐसी क्या जल्दबाजी थी कि ‘वंदे मातरम’ के मुद्दे को लेकर सदन की कार्यवाही बाधित करनी पड़ी। भाजपा ने हंगामा करके न केवल प्रश्नकाल को प्रभावित किया बल्कि विधानसभा की पुरानी और सम्मानजनक परंपरा को भी नुकसान पहुंचाया। विपक्ष के नेता के सदन में मौजूद नहीं होने के कारण भाजपा के दूसरे वरिष्ठ नेता ने खुद को राजनीतिक रूप से हाईलाइट करने के लिए यह रणनीति अपनाई।

‘वंदे मातरम’ के इतिहास का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि यह गीत भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत रहा है। उन्होंने बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय को इसकी रचना का श्रेय देते हुए कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस और जवाहरलाल नेहरू जैसे नेताओं और लाखों देशवासियों ने इसे प्रेरणा के रूप में अपनाया। जिस समय स्वतंत्रता आंदोलन चल रहा था, उस समय भाजपा का अस्तित्व ही नहीं था। भाजपा जिस विचारधारा से आगे बढ़ी है, उससे जुड़े लोगों ने स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका नहीं निभाई।

उन्होंने कहा कि आज कुछ ऐसे लोगों को स्वतंत्रता सेनानी के रूप में पेश करने की कोशिश की जा रही है, जिन्होंने कथित तौर पर अंग्रेजी शासन के सामने माफी मांगी थी। ‘फर्जी राष्ट्रवाद’ का मुद्दा खड़ा कर भाजपा उन सवालों से जनता का ध्यान हटाना चाहती है, जिनका सीधा संबंध आम लोगों की जिंदगी से है। देश में बेरोजगारी, महंगाई, युवाओं के मुद्दे, किसानों की समस्याएं, प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े विवाद और भ्रष्टाचार जैसे कई गंभीर मुद्दे हैं। ऐसे मुद्दों पर चर्चा होनी चाहिए, लेकिन उनकी जगह राष्ट्रवाद से जुड़े विवादों को आगे लाया जा रहा है।

उन्होंने युवाओं से जुड़े परीक्षा विवादों, नीट और कथित पेपर लीक के मुद्दों का भी जिक्र किया। साथ ही, चीन के साथ सीमा विवाद, किसानों, युवाओं और सेना से जुड़े मुद्दों को भी महत्वपूर्ण बताया। नेगी ने अग्निवीर योजना को लेकर भी भाजपा पर निशाना साधा और कहा कि इन सभी सवालों पर चर्चा होनी चाहिए, लेकिन इनसे ध्यान हटाने के लिए ‘वंदे मातरम’ जैसे मुद्दों को राजनीतिक रूप दिया जा रहा है।

जगत सिंह नेगी ने कहा कि ‘वंदे मातरम’ को लेकर किसी को यह बताने की जरूरत नहीं है कि देशभक्ति क्या होती है। देश का आम नागरिक भी इस गीत को गर्व और सम्मान के साथ गाता है। उन्होंने भाजपा से सवाल किया कि यदि ‘वंदे मातरम’ इतना महत्वपूर्ण मुद्दा है तो स्वतंत्रता आंदोलन के समय उनके वैचारिक पूर्वजों ने इसे लेकर क्या भूमिका निभाई थी। आज इस गीत में अलग-अलग राजनीतिक और वैचारिक बातें जोड़कर विवाद पैदा किया जा रहा है। ऐसे प्रयासों से देश की एकता, अखंडता और धर्मनिरपेक्षता पर भी सवाल खड़े हो सकते हैं।

राजस्व मंत्री ने विधानसभा में भाजपा विधायकों के विरोध के तरीके पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि विपक्ष को अपनी बात रखने का अधिकार है, लेकिन इसके लिए सदन की परंपराओं और कामकाज को बाधित करना उचित नहीं है। उन्होंने सवाल किया कि विपक्ष ने शोक प्रस्ताव, प्रश्नकाल और अन्य विधायी कामकाज को क्यों रोका। यदि भाजपा को ‘वंदे मातरम’ गाना था तो वह सदन की निर्धारित प्रक्रिया और समय के अनुसार अपनी बात रख सकती थी।

नेगी ने ‘वंदे मातरम’ को लेकर नए प्रोटोकॉल और कानूनों की चर्चा पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में बहुमत के आधार पर कानून बनाए जाते हैं, लेकिन भविष्य में सरकारें बदलने पर संसद या विधानसभा उन्हीं कानूनों में बदलाव या उन्हें निरस्त भी कर सकती है। किसी भी कानून को अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता और हर कानून को उसकी आवश्यकता, उद्देश्य और सामाजिक प्रभाव के आधार पर देखा जाना चाहिए।

जगत सिंह नेगी ने कहा कि राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान जैसे विषय देश की एकता और अखंडता से जुड़े हैं। ऐसे मुद्दों को राजनीतिक टकराव का माध्यम नहीं बनाया जाना चाहिए। यदि किसी प्रक्रिया या बदलाव से देश के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप, एकता और अखंडता पर सवाल खड़े होते हैं तो उस पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।