नई दिल्ली, 26 अगस्त (आईएएनएस)। भाद्रपद महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को देशभर में कृष्ण जन्माष्टमी का पर्व बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। मान्यता है कि इसी पावन तिथि की आधी रात रोहिणी नक्षत्र में भगवान श्रीकृष्ण ने धरती पर अवतार लिया था। इसलिए जन्माष्टमी की रात भगवान के बाल स्वरूप लड्डू गोपाल की पूजा और जन्मोत्सव का विशेष महत्व माना जाता है।
इस साल जन्माष्टमी की तारीख को लेकर थोड़ा असमंजस है। इसकी वजह अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र का समय है। पंचांग के अनुसार, अष्टमी तिथि 4 सितंबर 2026 को देर रात 2 बजकर 25 मिनट से शुरू होगी और 5 सितंबर को दोपहर 12 बजकर 13 मिनट पर समाप्त होगी। उदया तिथि के आधार पर जन्माष्टमी का पर्व 4 सितंबर 2026 को मनाया जाएगा। वहीं, वैष्णव संप्रदाय के लोग 5 सितंबर को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मनाएंगे।
जन्माष्टमी पर भगवान श्रीकृष्ण की पूजा आधी रात में करने की परंपरा है क्योंकि मान्यता है कि उनका जन्म मध्यरात्रि में हुआ था। इस बार निशिता पूजा मुहूर्त 4 सितंबर की रात 11:57 बजे से शुरू होकर 5 सितंबर को देर रात 12:43 बजे तक रहेगा। इसी दौरान भक्त बाल गोपाल का जन्मोत्सव मनाकर पूजा-अर्चना कर सकते हैं।
जन्माष्टमी के दिन भक्त सुबह स्नान करके व्रत और पूजा का संकल्प लेते हैं। दिनभर भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण और भजन-कीर्तन किया जाता है। रात में निशिता काल में पूजा की विशेष तैयारी की जाती है।
सबसे पहले लड्डू गोपाल को दूध, दही, शहद, घी और जल से अभिषेक कराया जाता है। इसके बाद उन्हें साफ या नए वस्त्र पहनाकर सुंदर तरीके से श्रृंगार किया जाता है। भगवान को माखन-मिश्री का भोग लगाना बेहद शुभ माना जाता है। भगवान श्रीकृष्ण की आरती करें। इसके बाद लड्डू गोपाल को फूलों से सजे झूले में विराजमान करके उन्हें झूला झुलाया जाता है।
वहीं, जो भक्त जन्माष्टमी का व्रत रखेंगे वे 5 सितंबर को सूर्योदय के बाद पारण कर सकते हैं। इस दिन सूर्योदय सुबह 5 बजकर 47 मिनट पर होगा। हालांकि व्रत खोलने का समय अपनी परंपरा और मान्यता के अनुसार तय करना उचित माना जाता है।
धार्मिक मान्यताओं में जन्माष्टमी के व्रत को बेहद पुण्यदायी बताया गया है। पुराणों में कहा गया है कि श्रद्धा और विधि-विधान से भगवान श्रीकृष्ण का व्रत और पूजन करने से व्यक्ति को पापों से मुक्ति मिलती है और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है।
