नई दिल्ली, 28 अगस्त (आईएएनएस)। उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर स्थित गांधी कॉलोनी में मेजर मनोज तलवार का जन्म 29 अगस्त 1969 को हुआ था। वह सैन्य परंपरा वाली पीढ़ी के तीसरे अधिकारी थे। उनके पिता, कैप्टन पीएल तलवार, सेना में एक सिविल इंजीनियर थे, जिन्होंने 1962 के युद्ध और 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान लद्दाख में दुनिया के सबसे ऊंचे हवाई अड्डों में से एक के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
पिता की सैन्य तैनाती के कारण मनोज तलवार का बचपन कानपुर छावनी (कैंट) के आसपास बीता। महज 10 वर्ष की आयु में कंटीले तारों के पार सेना के जवानों को परेड करते देख उनके बाल-मन पर गहरी छाप पड़ी। जब उनसे एक चित्रकला प्रतियोगिता में अपनी पसंद का विषय चुनने को कहा गया, तो उन्होंने एक ‘युद्ध दृश्य’ उकेरा।
उन्होंने असाधारण प्रतिभा के बल पर आर्म्ड फोर्सेज मेडिकल कॉलेज (एएफएमसी) और नेशनल डिफेंस एकेडमी (एनडीए) दोनों की प्रवेश परीक्षाएं एक साथ उत्तीर्ण कीं, लेकिन एक सुरक्षित डॉक्टर की जिंदगी के बजाय उन्होंने मातृभूमि की अग्रिम मोर्चे पर रक्षा करने के लिए इन्फैंट्री अफसर बनना चुना।
दिसंबर 1992 में मेजर मनोज को महार रेजीमेंट की तीसरी बटालियन (3 महार) में कमीशन प्राप्त हुआ। वर्ष 1994 में उन्होंने महू स्थित आर्मी वॉर कॉलेज से कमांडो ट्रेनिंग पूरी की। असम में ‘ऑपरेशन राइनो’ के तहत उल्फा उग्रवादियों के सफाए के लिए चलाए गए अभियानों में उनके बेजोड़ नेतृत्व और साहस के लिए उन्हें प्रतिष्ठित ‘सेना मेडल’ से सम्मानित किया गया।
उनके बेहतरीन प्रदर्शन को देखते हुए, फरवरी 1999 में उन्हें उनकी विशेष मांग पर ‘आउट ऑफ टर्न’ (समय से पूर्व) तैनाती देकर 9 महार बटालियन के साथ सियाचिन के साल्तोरो रिज पर भेज दिया गया।
मई 1999 में जब कारगिल की चोटियों पर पाकिस्तानी घुसपैठियों ने कब्जा जमा लिया, तो टुरटुक सब-सेक्टर में दुश्मनों को खदेड़ने के लिए सेना ने एक विशेष अभियान की रूपरेखा तैयार की, जिसे उनके नाम पर ‘ऑपरेशन तलवार’ का कोडनेम दिया गया।
13 जून 1999 की अंधेरी और सर्द रात में, शून्य से 40 से 60 डिग्री नीचे के तापमान और खड़ी बर्फीली चट्टानों के बीच मेजर तलवार अपनी टुकड़ी के साथ आगे बढ़े। पाकिस्तानी सेना ने ऊपर से भारी तोपखाने और मोर्टार से गोलाबारी शुरू कर दी।
इस भीषण हमले में एक जवान घायल हो गया, जिसके बाद मेजर तलवार ने खुद मशीन गन उठाने का अदम्य साहस दिखाया और अपनी टुकड़ी को जवाबी कार्रवाई के लिए प्रेरित किया। दुश्मनों के मोर्टार और ग्रेनेड के छर्रे लगने से वे बुरी तरह घायल हो गए, लेकिन उन्होंने दुश्मन को चकमा देने के लिए अपनी टुकड़ी को सामने से घेरने का आदेश दिया, जो एक बेहद खतरनाक लेकिन रणनीतिक कदम था।
13 और 14 जून की मध्यरात्रि को, अपने प्राणों की बाजी लगाकर उन्होंने पॉइंट 5765 पर कब्जा कर लिया और उस दुर्गम चोटी पर भारत का राष्ट्रीय ध्वज लहराया।
तिरंगा फहराने और अपना मिशन पूरा करने के कुछ ही क्षणों बाद, दुश्मन के एक मोर्टार शेल का छर्रा सीधे उनकी आंख में आ लगा और यह वीर सपूत 19,000 फीट गहरी खाई में गिर गया। मात्र 29 वर्ष की आयु में उन्होंने शहादत की वह इबारत लिखी, जिसने कारगिल युद्ध की दिशा बदल दी। उनका पार्थिव शरीर 16 जून 1999 को उनके घर मेरठ पहुंचा था।
मेजर मनोज तलवार के इस अकल्पनीय शौर्य और बलिदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत ‘वीर चक्र’ से सम्मानित किया। उनके सामरिक योगदान के महत्व को देखते हुए पॉइंट 5765 को हमेशा के लिए ‘तलवार टॉप’ और ‘तलवार बेस’ का नाम दिया गया। इतना ही नहीं, 9 महार ने सियाचिन के तीसरे ग्लेशियर का नाम भी उनके सम्मान में ‘मेजर मनोज तलवार ग्लेशियर’ रखा है।
मेरठ के कमिश्नरी चौक से उनके घर तक जाने वाले मार्ग को उनके नाम से जाना जाता है और वहां उनकी एक प्रतिमा भी स्थापित की गई है।
