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केरल: सीपीआई बनाम सीपीआईएम विवाद में आईयूएमएल भी शामिल, पिनाराई विजयन पर लगाए गंभीर आरोप

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तिरुवनंतपुरम, 29 अगस्त (आईएएनएस)। इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) के सीनियर नेता और पूर्व विधायक के.पी.ए. मजीद ने विपक्ष के उप-नेता के पद को लेकर सीपीआई (एम) के साथ बढ़ते टकराव में सीपीआई का समर्थन किया है। उन्होंने पिनाराई विजयन पर आरोप लगाया है कि वे एलडीएफ में वामपंथी गठबंधन के छोटे सहयोगी दल के साथ किसी मातहत की तरह व्यवहार कर रहे हैं।

शनिवार को आईयूएमएल के मुखपत्र ‘चंद्रिका’ में छपे एक लेख में मजीद ने कहा कि पिनराई का यह दावा कि सीपीआई को विपक्ष के उप-नेता के पद के बारे में बात भी नहीं करनी चाहिए और यह तय करना कि सीपीआई (एम) का कौन सा नेता यह पद संभालेगा, असल में उनके वामपंथी मोर्चे में ‘मालिक’ की भूमिका निभाने जैसा है।

मजीद ने तर्क दिया कि केरल की राजनीति की बुनियादी समझ रखने वाला कोई भी व्यक्ति इस बात को स्वीकार नहीं करेगा कि सीपीआई नेताओं को बस सीपीआई (एम) के सामने झुक जाना चाहिए और उसके आदेशों का पालन करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि चुनावी ताकत चाहे जो भी हो, आधुनिक केरल के राजनीतिक इतिहास में सीपीआई की अपनी अलग पहचान और एक महत्वपूर्ण स्थान है। उनकी यह टिप्पणी एलडीएफ के दो मुख्य घटकों के बीच सार्वजनिक रूप से बढ़ती कड़वाहट के बीच आई है।

140 सदस्यों वाली विधानसभा में सीपीआई (एम) के 26 विधायकों के मुकाबले सीपीआई के 8 विधायक हैं। विपक्षी गठबंधन में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते सीपीआई ने विपक्ष के उप-नेता का पद मांगा है। पिनाराई ने इस मांग को खारिज करते हुए कहा कि यह पद सीपीआई (एम) के नेता को ही मिलेगा।

मजीद का तर्क था कि सीपीआई (एम) के दबदबे वाले एलडीएफ में शामिल होने के बाद से सीपीआई को लगातार हाशिए पर धकेला गया है। उन्होंने बताया कि एलडीएफ के चेयरमैन और कन्वीनर जैसे अहम संगठनात्मक पद भी सीपीआई (एम) के पास ही रहे हैं।

उन्होंने मौजूदा विवाद से आगे बढ़कर केरल में सीपीआई के ऐतिहासिक योगदान, खासकर सी. अच्युत मेनन सरकार (1970-77) में उनकी भूमिका का जिक्र किया, जिसमें कांग्रेस मुख्य भूमिका में थी।

मजीद ने शिक्षा, स्वास्थ्य और भूमि सुधार के क्षेत्र में केरल के विकास की नींव रखने का श्रेय सीपीआई के नेतृत्व वाली सरकार को दिया। साथ ही, उन्होंने सीपीआई (एम) पर आरोप लगाया कि उसने जानबूझकर अच्युत मेनन के योगदान को नजरअंदाज किया और भूमि सुधार का श्रेय मुख्य रूप से ईएमएस नंबूदरीपाद और केआर गौरी अम्मा को दिया।

पिछली एलडीएफ सरकार के दौरान हुए पीएम श्री विवाद का जिक्र करते हुए मजीद ने याद दिलाया कि कैसे सीपीआई ने पिनाराई विजयन और वी. सिवनकुट्टी द्वारा किए गए समझौते का विरोध किया था। उन्होंने कहा कि सीपीआई की आपत्तियों को अक्सर सीपीआई (एम) ने नजरअंदाज किया है।

मजीद ने कहा कि पिछले 25 सालों से एलडीएफ के भीतर सीपीआई जिस तरह से घुटन महसूस कर रही है, उस पर लोकतंत्र में विश्वास रखने वाले हर व्यक्ति को चिंता होनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि सीपीआई को एलडीएफ में बने रहना चाहिए या किसी दूसरे विकल्प पर विचार करना चाहिए, इस सवाल पर तभी चर्चा होनी चाहिए जब पार्टी अपना रुख स्पष्ट कर दे।

उन्होंने इस बात को भी खारिज कर दिया कि सीपीआई के भविष्य के राजनीतिक फैसलों से यूडीएफ को कोई खतरा होगा। उन्होंने तर्क दिया कि वी.डी. सतीशन सरकार के शुरुआती 100 दिनों ने यह साबित कर दिया है कि यूडीएफ केरल में वामपंथी विचारधारा वाली जगह का प्रतिनिधित्व कर सकता है।

मजीद ने कहा, “सिर्फ एलडीएफ का लेबल लगाने से कोई गठबंधन वामपंथी नहीं बन जाता।”