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जादवपुर विश्वविद्यालय में फिलहाल कोई निर्वाचित छात्र संघ नहीं, आरटीआई में खुलासा

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कोलकाता, 1 सितंबर (आईएएनएस)। जादवपुर विश्वविद्यालय प्रशासन ने मंगलवार को स्पष्ट किया कि विश्वविद्यालय के किसी भी विभाग में फिलहाल कोई निर्वाचित छात्र संघ (स्टूडेंट्स यूनियन) कार्यरत नहीं है। यह जानकारी नेशनल स्टूडेंट्स फ्रंट के एक सदस्य द्वारा दायर आरटीआई आवेदन के जवाब में दी गई।

जादवपुर विश्वविद्यालय में तीन छात्र संघ होते हैं, जिनमें फैकल्टी ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी स्टूडेंट्स यूनियन, साइंस फैकल्टी स्टूडेंट्स यूनियन और आर्ट्स फैकल्टी स्टूडेंट्स यूनियन शामिल हैं।

आरटीआई के जवाब में विश्वविद्यालय के वरिष्ठ निदेशक (युवा कल्याण) एवं लोक सूचना अधिकारी बप्पा मलिक ने कहा कि वर्तमान में फैकल्टी ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी स्टूडेंट्स यूनियन, साइंस फैकल्टी स्टूडेंट्स यूनियन और आर्ट्स फैकल्टी स्टूडेंट्स यूनियन में कोई भी निर्वाचित छात्र निकाय मौजूद नहीं है, और न ही इन छात्र संघों के तहत कोई निर्वाचित पदाधिकारी कार्य कर रहा है।

आईएएनएस को जादवपुर विश्वविद्यालय की ओर से दिया गया आधिकारिक लिखित जवाब प्राप्त हुआ है।

आरटीआई जवाब में यह भी बताया गया है कि विश्वविद्यालय में आखिरी बार छात्र संघ चुनाव फरवरी 2020 में हुए थे। उस समय चुने गए पदाधिकारियों का कार्यकाल फरवरी 2021 में समाप्त हो गया था।

ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली पिछली तृणमूल कांग्रेस सरकार के दौरान छात्रों ने कई बार छात्र संघ चुनाव कराने की मांग उठाई थी।

हालांकि, राज्य के शिक्षा विभाग और तत्कालीन सरकार की ओर से बार-बार आश्वासन दिए जाने के बावजूद चुनाव नहीं कराए गए।

पश्चिम बंगाल में भाजपा के नेतृत्व वाली नई सरकार के सत्ता में आने के बाद जादवपुर विश्वविद्यालय के छात्र एक बार फिर जल्द से जल्द छात्र संघ चुनाव कराने की मांग कर रहे हैं।

पिछले महीने के अंतिम दिनों में जादवपुर विश्वविद्यालय उस समय चर्चा में आया था, जब सीपीआई(एम) की छात्र इकाई स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं के बीच दो बार झड़प हुई थी। इन झड़पों में दोनों संगठनों के कई छात्र कार्यकर्ता घायल हुए थे।

हाल ही में जादवपुर विश्वविद्यालय में आयोजित रक्षाबंधन कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने कहा था कि कभी उत्कृष्टता का केंद्र माने जाने वाले इस विश्वविद्यालय में पहले कम्युनिस्टों और बाद में तृणमूल कांग्रेस ने राष्ट्र-विरोधी सोच को बढ़ावा दिया।