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‘चाहूंगा मैं तुझे शाम सवेरे…’ से मिली जबरदस्त पहचान, फिर 635 फिल्मों तक गूंजे लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के धुन

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नई दिल्ली, 2 सितंबर (आईएएनएस)। हिंदी सिनेमा के संगीत की बात हो और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल का नाम न आए, ऐसा हो ही नहीं सकता। एक दौर था जब फिल्मों की कहानी के साथ उनके गाने भी दर्शकों के दिल में उतरते थे। कभी प्यार की मीठी धुन, कभी दर्द भरी आवाज, कभी मस्ती से भरा संगीत और कभी देशभक्ति का जोश—लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने हर तरह के संगीत को अपने अंदाज में सजाया। करीब साढ़े तीन दशक लंबे करियर में इस जोड़ी ने लगभग 635 फिल्मों के लिए संगीत दिया।

लक्ष्मीकांत का जन्म 1937 में एक साधारण महाराष्ट्रियन परिवार में हुआ था। उनका पूरा नाम लक्ष्मीकांत शांताराम कुदलकर था। घर की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं थी लेकिन संगीत के लिए उनका जुनून कम उम्र से ही दिखाई देने लगा था। उन्होंने खुद ही मैंडोलिन और वायलिन बजाना सीखा और धीरे-धीरे संगीत कार्यक्रमों और फिल्मी गानों की रिकॉर्डिंग में वाद्ययंत्र बजाने लगे।

प्यारेलाल का जन्म 1940 में उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में हुआ था। उनके पिता पंडित रामप्रसाद शर्मा मशहूर ट्रंपेट वादक थे और उन्हें संगीत की शुरुआती शिक्षा अपने पिता से ही मिली। बाद में उन्होंने गोवा के गोंसाल्वेस से वायलिन सीखा। महज 12 साल की उम्र में प्यारेलाल संगीत कार्यक्रमों और फिल्म रिकॉर्डिंग में वायलिन बजाने लगे थे।

लक्ष्मीकांत और प्यारेलाल की पहली मुलाकात बचपन में मुंबई के स्टूडियो और लता मंगेशकर द्वारा संचालित सुरील कला केंद्र में हुई थी। दोनों की दोस्ती धीरे-धीरे गहरी होती चली गई। दोनों की उम्र और आर्थिक पृष्ठभूमि काफी हद तक समान थी। शायद यही वजह थी कि वे एक-दूसरे को अच्छी तरह समझते थे। रिकॉर्डिंग स्टूडियो में घंटों साथ रहते, एक-दूसरे के लिए काम ढूंढते और मौका मिलते ही साथ में वाद्ययंत्र बजाते।

लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने उस दौर के कई बड़े संगीतकारों के साथ काम किया। 1953 में वे कल्याणजी-आनंदजी के सहायक बने और करीब एक दशक तक उनके साथ काम किया। इसके अलावा उन्होंने सचिन देव बर्मन और राहुल देव बर्मन जैसे संगीतकारों के लिए भी संगीत संयोजन का काम किया।

प्यारेलाल ने ऑर्केस्ट्रा के साथ अपने हुनर को और निखारा। वे बॉम्बे चैंबर ऑर्केस्ट्रा और परांजोति अकादमी से जुड़े रहे। गुडी सीरवई, कूमी वाडिया, मेहली मेहता और जुबिन मेहता जैसे दिग्गजों की संगति ने उनके संगीत को नई ऊंचाई दी।

एक समय ऐसा भी आया जब दोनों अपने काम के बदले मिलने वाले पैसे से संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने मद्रास जाने का फैसला किया लेकिन वहां भी हालात बहुत अलग नहीं मिले और आखिरकार मुंबई लौटना पड़ा। प्यारेलाल ने तो एक समय विदेश जाकर सिम्फनी ऑर्केस्ट्रा के साथ काम करने का मन भी बना लिया था लेकिन लक्ष्मीकांत के आग्रह पर उन्होंने भारत में ही रहने का फैसला किया। यही फैसला आगे चलकर हिंदी सिनेमा के इतिहास का एक खूबसूरत अध्याय बना।

संगीत निर्देशक के रूप में लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल को पहला स्वतंत्र मौका बाबूभाई मिस्त्री की फिल्म ‘पारसमणि’ (1963) में मिला। पहली ही फिल्म के संगीत ने लोगों का ध्यान खींच लिया लेकिन असली धमाका अगले साल फिल्म ‘दोस्ती’ (1964) से हुआ।

कम बजट की इस फिल्म के गाने जबरदस्त हिट हुए। ‘चाहूंगा मैं तुझे शाम सवेरे’ जैसे गीत ने लक्ष्मी-प्यारे को घर-घर पहुंचा दिया। फिल्म ने उन्हें पहला फिल्मफेयर पुरस्कार भी दिलाया। इसके बाद दोनों ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

फिर आया फिल्मों और सुपरहिट गीतों का ऐसा सिलसिला, जिसने उन्हें हिंदी फिल्म संगीत के सबसे सफल संगीतकारों में शामिल कर दिया। ‘मिलन’, ‘जीने की राह’, ‘दो रास्ते’, ‘खिलौना’, ‘शोर’, ‘प्रेम रोग’, ‘राम लखन’, ‘खलनायक’ और ‘त्रिमूर्ति’ जैसी फिल्मों में उनका संगीत सुनाई दिया।

उनके गीतों में मोहम्मद रफी, लता मंगेशकर, किशोर कुमार, आशा भोसले, मुकेश और अलका याज्ञनिक जैसे महान गायकों की आवाजें गूंजीं। आरडी बर्मन के साथ उनकी दोस्ती भी खास रही। दोनों के बीच पेशेवर प्रतिस्पर्धा से ज्यादा दोस्ती और आपसी सम्मान था। दोनों ने अपने करियर में सात फिल्मफेयर पुरस्कार जीते। उनकी धुनों ने कई पीढ़ियों को प्रभावित किया और हिंदी फिल्मों के संगीत को एक अलग पहचान दी।

25 मई 1998 को लक्ष्मीकांत का निधन हो गया। उनके जाने से लक्ष्मी-प्यारे की जोड़ी भले ही टूट गई लेकिन उनके बनाए सुर कभी नहीं टूटे। प्यारेलाल आज भी संगीत से जुड़े हुए हैं।