नई दिल्ली, 4 सितंबर (आईएएनएस)। 5 सितंबर 1888 को तमिलनाडु के एक छोटे से गांव तिरुत्तनी में जन्मे सर्वपल्ली राधाकृष्णन का बचपन आर्थिक तंगी और गरीबी में बीता। एक रूढ़िवादी ब्राह्मण परिवार से ताल्लुक रखने वाले उनके पिता चाहते थे कि उनका बेटा अंग्रेजी शिक्षा ग्रहण करने के बजाय मंदिर का पुजारी बन जाए। लेकिन, राधाकृष्णन की बौद्धिक क्षमता इतनी प्रखर थी कि उन्होंने प्रारंभिक स्कूली शिक्षा से लेकर मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज तक का पूरा सफर केवल स्कॉलरशिप (छात्रवृत्ति) के दम पर तय किया।
वे मूल रूप से दर्शनशास्त्र नहीं, बल्कि गणित पढ़ना चाहते थे। पैसों की कमी के कारण उनके लिए नई किताबें खरीदना संभव नहीं था। ऐसे में उनके एक चचेरे भाई ने उन्हें दर्शनशास्त्र की अपनी पुरानी किताबें मुफ्त में दे दीं, और इसी एक घटना ने उनकी अकादमिक दिशा हमेशा के लिए तय कर दी। महज 20 वर्ष की आयु में उन्होंने ‘वेदांत की नैतिकता’ पर अपना शोध पत्र लिखा, जिसने हिंदू धर्म की आलोचना करने वाले पश्चिमी विचारकों को तार्किक और करारा जवाब दिया। बिना किसी औपचारिक पीएचडी की डिग्री के ही उन्होंने ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में ‘स्पैल्डिंग प्रोफेसर’ के रूप में अपनी विद्वता का लोहा मनवाया और भारतीय दर्शन को वैश्विक पटल पर स्थापित किया।
एक बेहतरीन शिक्षक के रूप में मैसूर से लेकर कलकत्ता और ऑक्सफोर्ड तक का सफर तय करने वाले डॉ. राधाकृष्णन एक बेजोड़ कूटनीतिज्ञ भी साबित हुए। 1949 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें सोवियत संघ का राजदूत बनाकर मॉस्को भेजा, तो कई लोगों को हैरानी हुई कि एक वेदांत का दार्शनिक कम्युनिस्ट रूस में क्या करेगा।
लेकिन, जब उनकी मुलाकात दुनिया के सबसे खूंखार तानाशाहों में से एक जोसेफ स्टालिन से हुई, तो उन्होंने अपनी मानवीय कूटनीति का परिचय दिया। बातचीत के दौरान राधाकृष्णन ने सम्राट अशोक का उदाहरण देते हुए शांति की बात की। उन्होंने निडर होकर जोसेफ स्टालिन की पीठ थपथपाई। एक इंसान के रूप में मिला यह वात्सल्य देखकर स्टालिन जैसा तानाशाह भी भावुक हो गया। उसने कहा था कि राधाकृष्णन पहले व्यक्ति हैं, जिन्होंने उसे एक राक्षस नहीं, बल्कि एक इंसान समझा। इसी तरह 1957 में एक आधिकारिक मुलाकात के दौरान उन्होंने चीनी नेता माओत्से तुंग के गाल भी थपथपाए थे, जिससे माओ भी अपनी तमाम राजनीतिक चालाकियों के बावजूद हैरान रह गए थे।
साल 1948 में डॉ. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में ‘विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग’ का गठन किया गया, जिसने स्वतंत्र भारत की उच्च शिक्षा की रूपरेखा तैयार की और ‘विश्वविद्यालय अनुदान आयोग’ (यूजीसी) की स्थापना की मजबूत सिफारिश की। 1952 में भारत के पहले उपराष्ट्रपति और 1962 में दूसरे राष्ट्रपति बनने के बाद भी उनका जीवन बेहद साधारण रहा। जब वे राज्यसभा के सभापति थे, तो सदन में तीखी बहसों को शांत करने के लिए वे अचानक संस्कृत के श्लोक या बाइबिल की पंक्तियां पढ़ने लगते थे, जिससे तनावपूर्ण माहौल तुरंत शांत हो जाता था।
उनके कार्यकाल (1962-1967) के दौरान भारत ने दो बड़े युद्ध (1962 का चीन युद्ध और 1965 का पाकिस्तान युद्ध) झेले। इन कठिन परिस्थितियों में उन्होंने एक दृढ़ राजनेता के रूप में देश का मार्गदर्शन किया।
उन्हें 1931 में ब्रिटिश सरकार ने शिक्षा के क्षेत्र में उत्कृष्ट सेवाओं के लिए नाइटहुड की उपाधि दी। उन्होंने 1949 से 1952 तक सोवियत संघ में भारत के राजदूत के रूप में ऐतिहासिक कूटनीतिक सेवाएं दीं। 1954 में प्रथम समूह में भारत रत्न से सम्मानित हुए। 1962 में भारत के दूसरे राष्ट्रपति बने और शिक्षक दिवस की शुरुआत हुई। उन्होंने 1975 में टेम्पलटन पुरस्कार पाकर राशि ऑक्सफोर्ड को दान की।
राष्ट्रपति के रूप में उनका आधिकारिक वेतन 10,000 रुपए प्रति माह था, लेकिन वे इसमें से केवल 2,500 रुपए ही स्वीकार करते थे और शेष 7,500 रुपए हर महीने ‘प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष’ में दान कर देते थे। 1962 में जब उन्होंने राष्ट्रपति का पद संभाला, तो उनके कुछ पुराने छात्रों और मित्रों ने 5 सितंबर को उनका जन्मदिन भव्य रूप से मनाने की अनुमति मांगी।
इस पर उनका जवाब उनके महान चरित्र का सबसे बड़ा प्रमाण था। उन्होंने विनम्रता से कहा, “मेरा जन्मदिन मनाने के बजाय, यदि 5 सितंबर को ‘शिक्षक दिवस’ के रूप में मनाया जाए, तो यह मेरे लिए गर्व की बात होगी।” डॉ. राधाकृष्णन का दृढ़ विश्वास था कि देश के सर्वश्रेष्ठ दिमाग वालों को ही शिक्षक होना चाहिए। अपने जीवन में 27 बार नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित होने वाले इस महान दार्शनिक ने 17 अप्रैल 1975 को अंतिम सांस ली।
