नई दिल्ली, 5 सितंबर (आईएएनएस)। मोटापे से संबंधित शिखर सम्मेलन में एम्स नई दिल्ली के प्रोफेसर डॉ. नवल विक्रम ने कहा कि सिर्फ बीएमआई से मोटापे का सही अंदाजा नहीं लगाया जा सकता, क्योंकि यह फैट और मसल में फर्क नहीं करता। असली खतरा पेट और कमर पर जमा मेटाबॉलिकली एक्टिव फैट से है, जो कई बीमारियों का कारण बनता है। उन्होंने बच्चों के लिए नई इंजेक्टेबल दवाओं के इस्तेमाल, सरकारी गाइडलाइन और खान-पान में सुधार को लेकर भी जरूरी सलाह दी।
डॉ. नवल विक्रम ने कहा, “बीएमआई एक मापदंड है, जो बहुत लंबे समय से मोटापे को डिफाइन करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। आज भी इसका इस्तेमाल किया जाता है। बीएमआई यह नहीं पता करता है कि हमारे शरीर में फैट कितना है, मांस कितना है। अगर कोई एथलीट होगा, जिसका बीएमआई 30 है, उसमें मसल बहुत ज्यादा होगा, फैट 15 फीसदी होगा। दूसरी तरफ 30 बीएमआई का कोई और व्यक्ति है, जिसमें फैट होगा 40 फीसदी और मसल होगा 15 फीसदी। इन दोनों में, दोनों का बीएमआई बराबर है, लेकिन अगर सिर्फ बीएमआई देखें तो दोनों ही मोटापे की कैटेगरी में माने जाएंगे।”
उन्होंने बताया कि अगर हम देखें कि तकलीफ किसे ज्यादा होगी, किसके अंदर डायबिटीज की शिकायत हो सकती है, और किसको हार्ट से संबंधित बीमारी होगी, तो ये उसे ज्यादा होगा, जिसके शरीर में फैट ज्यादा होगा। बीएमआई, फैट और नॉन-फैट में अंतर नहीं कर पाता है। इसलिए बेहतर है कि अगर बीएमआई के साथ कोई और फैट माप सकते हैं, तो वह इस्तेमाल करें। जो मोटापा पेट पर और कमर पर होती है, वह एक अच्छा मापदंड होता है कि आपके पेट के अंदर कितना फैट इकट्ठा है। अगर आपकी जांघों पर फैट है, तो वह परेशान नहीं करता है। अगर पेट के अंदर फैट इकट्ठा है, तो वह सबसे खतरनाक होता है। वह हार्मोन, साइटोकाइन, बड़ी सारी चीजें बनाता है, जिनका असर शरीर के ऑर्गन्स पर खराब पड़ता है।
उन्होंने बताया कि एक और मापदंड ये हो सकता है, कमर देखिए और अपनी लंबाई देखिए। आपकी लंबाई 160 सेंटीमीटर है, तो आपकी कमर 80 सेंटीमीटर से ऊपर नहीं होनी चाहिए, चाहे पुरुष हों या महिला। एक सामान्य बात है कि अपनी कमर को लंबाई का आधा रखिए, तो आप स्वस्थ रहेंगे। इसका मतलब आपमें एब्डॉमिनल ओबेसिटी नहीं रहेगी। यह बहुत जरूरी है। बच्चों में मोटापे के इलाज के लिए जो नई इंजेक्टेबल दवाएं आई हैं, वे बेहद स्पेशलाइज्ड हैं। इन्हें कोई भी डॉक्टर प्रिस्क्राइब नहीं कर सकता। सरकारी गाइडलाइन के मुताबिक, सिर्फ एमडी मेडिसिन या एंडोक्राइनोलॉजिस्ट ही इन्हें लिखने के लिए अधिकृत हैं।
उन्होंने बताया कि डेटा के मुताबिक ये दवाइयां काफी कारगर हैं और इनसे वजन कम करने में काफी मदद मिलती है, लेकिन इन्हें लंबे समय तक लगातार लेना पड़ता है। अगर 2, 3 या 6 महीने लेकर छोड़ दिया जाए तो कोई फायदा नहीं होता और वजन फिर से बढ़ जाता है। जितने लंबे समय तक इन्हें लिया जाता है, वजन उतने ही लंबे समय तक कंट्रोल में रह सकता है। ये दवाइयां अब तक सिर्फ वयस्कों के लिए थीं, लेकिन अब एक दवाई को 12 साल से ऊपर के बच्चों के लिए भी जरूरत पड़ने पर इस्तेमाल की अनुमति मिल गई है।
उन्होंने कहा कि खान-पान सबसे अहम है। सबसे पहले उसी पर ध्यान देना चाहिए। जितनी भूख हो, उसका 70-80 फीसदी ही खाएं, पूरा पेट भरकर खाने से बचें। खाने का एक फिक्स्ड पैटर्न बनाएं और हमेशा ताजा पका हुआ भोजन करें। घर का बना हो या पैकेट वाला, हाई साल्ट, हाई शुगर और हाई फैट वाली चीजों को कम करना जरूरी है। प्रधानमंत्री ने भी खाने में 10 फीसदी तेल कम करने की बात कही है, इससे सबसे ज्यादा कैलोरी घटती है।
