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सत्य निकेतन हादसा: छात्रों ने बयां किया खौफनाक मंजर, कहा-हमारी जान की कोई कीमत नहीं

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नई दिल्ली, 7 सितंबर (आईएएनएस)। दक्षिणी दिल्ली के सत्य निकेतन में जब बहुमंजिला इमारत गिरी तो आसपास मौजूद लोग सहम गए थे। हादसे के समय घटनास्थल के पास रहे छात्र और स्थानीय लोगों ने आईएएनएस से बातचीत में आंखों देखा हाल बताया।

चश्मदीद छात्र अभिनव ने कहा, “कल मैं और मेरे दोस्त बाजार जा रहे थे। जैसे ही हम बाहर निकले और नीचे आए, पूरी गली धूल से भर गई थी। अगर मैं कुछ मिनट पहले निकला होता, तो शायद मैं मलबे के नीचे ही होता, क्योंकि मेट्रो स्टेशन जाने के लिए हम अक्सर इसी रास्ते का इस्तेमाल करते हैं। अगर हम थोड़ा और पहले निकले होते, तो हम भी इसकी चपेट में आ जाते। सब कुछ हमारी आंखों के सामने हुआ। मुझे नहीं लगता कि यहां किसी भी पीजी में 40-50 से कम छात्र रहते होंगे। लगभग सभी पीजी के हालात एक जैसे ही हैं। छात्रों के पास इन्हें किराए पर लेने के अलावा कोई चारा नहीं है, क्योंकि कोई दूसरा विकल्प मौजूद ही नहीं है। हम स्टूडेंट अच्छे नंबर लाकर इतनी बड़ी यूनिवर्सिटी में कॉलेज में एडमिशन पाते हैं लेकिन यहां पर हम ऐसे पीजी में रहने के लिए मजबूर हैं, जिनकी हालत इतनी खस्ता है। हमारी लाइफ की यहां पर कोई कीमत नहीं है। सब लोग यहां पर मिले हुए हैं, गवर्मेंट भी मिली हुई है, इसलिए इस तरह के पीजी चल रहे हैं।”

चश्मदीद छात्र रितिक ने कहा, “मैं यहीं पास में एक पीजी में रहता हूं। जब यह घटना हुई, तो मैं पास की ही स्टेशनरी की दुकान पर खड़ा था। मैंने देखा कि इमारत हिल रही है और जब मैं उस जगह की ओर भागा, तो पूरी इमारत ढह गई। मैंने यह हादसा अपनी आंखों से देखा है। मेरा दिल रो रहा है और मैं अपने दुख को शब्दों में बयां नहीं कर सकता। फिर भी कोई भी आगे नहीं आ रहा है और न ही कोई जिम्मेदारी ले रहा है। मैं जवाबदेही कहां मांगू?

स्थानीय निवासी विजय ने कहा, “हादसा होने के कुछ ही मिनटों के अंदर हमें इसकी जानकारी मिल गई। हम पास के पार्क में बैठे थे और तुरंत मौके पर पहुंचे। वहाँ पहुंचने पर अफरातफरी मची हुई थी और चारों ओर धूल के गुबार उठ रहे थे। हमने आसपास देखा, कुछ मलबा हटाया और अंदर गए। वहां हमें एक व्यक्ति मिला, जिसके मुंह से खून निकल रहा था। हम करीब 10-12 लोग थे। हमने उसे बाहर निकाला, उसके ऊपर कंक्रीट का एक बहुत बड़ा स्लैब गिरा हुआ था, जिसे उठाने में काफी मशक्कत करनी पड़ी। हमने उसे उठाया, उस व्यक्ति को बाहर निकाला और तुरंत एम्बुलेंस में डालकर अस्पताल भेजा। अभी खबर है कि उसकी हालत पूरी तरह स्थिर और ठीक है।

विजय ने कहा, “सत्य निकेतन में कई इमारतें अभी भी ऐसी ही हालत में हैं। यहां तीन-चार और इमारतें हैं जो साफ तौर पर झुकी हुई दिख रही हैं। कल की ही बात है, जब हम लोगों को बचाने के लिए ऊपर चढ़े तो बगल वाली इमारत भी हिल रही थी। हम तुरंत पीछे हट गए ताकि खुद न दब जाएं। ऊपर जाने की कोशिश करने से पहले हमने जमीनी स्तर पर जितना हो सका, मलबा हटाया। थोड़ी देर बाद एनडीआरएफ की टीम पहुंची और बचाव अभियान का पूरा जिम्मा संभाल लिया।”

एक स्थानीय बुजुर्ग ने कहा, “मैं यहीं मोती बाग गांव में रहता हूं। मेरी उम्र लगभग 74 साल है और यह पूरी कॉलोनी मेरी आँखों के सामने ही बनी थी। इसे अगस्त 1964 में ‘जेजे कॉलोनी’ के नाम से बसाया गया था। कागजों पर आधिकारिक तौर पर यह आज भी ‘जेजे कॉलोनी’ ही है। सरकारी रिकॉर्ड में इसका नाम ‘सत्य निकेतन’ करने के लिए आज तक कोई नोटिफिकेशन जारी नहीं हुआ है, भले ही मुख्य सड़क समेत हर जगह ‘सत्य निकेतन’ लिखे बोर्ड लगा दिए गए हों। यहां हर तरह की गतिविधियां होती हैं और पिछले 14-15 सालों में यहां पीजी का कारोबार बहुत तेजी से बढ़ा है। इस पूरे मामले में मुख्य गलती प्रॉपर्टी के मालिक की है। जब भी किसी घर या कमर्शियल दुकान की मरम्मत या रेनोवेशन का काम होता है, तो इसकी जिम्मेदारी मालिक की होती है। हर चीज की देखरेख करना मालिक का ही काम है। उन्होंने इसे किराए पर दिया था या कैसे मैनेज किया, इसकी सही जानकारी किसी को नहीं है।”