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‘अक्साई चिन और अरुणाचल का जर्रा-जर्रा भारत का’, यूएन के नक्शे पर कांग्रेस सांसद ने जताई आपत्ति, सरकार पर साधा निशाना

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नई दिल्ली, 9 सितंबर (आईएएनएस)। संयुक्त राष्ट्र के नए नक्शे पर विवाद के बीच कांग्रेस ने सरकार पर निशाना साधा है। पार्टी के वरिष्ठ नेता प्रमोद तिवारी ने कहा कि अक्साई चिन और अरुणाचल प्रदेश का जर्रा-जर्रा भारत का है। इस पर कोई समझौता नहीं हो सकता। साथ ही, उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर सरकार की चुप्पी निंदनीय है।

कांग्रेस सांसद प्रमोद तिवारी ने समाचार एजेंसी आईएएनएस से बातचीत में कहा, “यह संयुक्त राष्ट्र का जारी किया गया नक्शा है और यह गलत है। यह भारत की सार्वभौमिकता के खिलाफ है। हमारे प्रधानमंत्री कहीं और व्यस्त हैं। वे इतने कमजोर हो गए हैं कि इस मुद्दे पर चुप हैं, जबकि कूटनीतिक और विदेश नीति के स्तर पर इस पर आपत्ति जताने की जरूरत थी।”

उन्होंने आगे कहा, “अक्साई चिन और अरुणाचल प्रदेश का जर्रा-जर्रा भारत का है। इस पर कोई समझौता नहीं हो सकता। मैं इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री की चुप्पी और गंभीरता की कमी की निंदा करता हूं। मैं चाहता हूं कि भारत अपनी कड़ा आपत्ति दर्ज कराए।”

दिल्ली में मणिपुर के एक म्यूजिक टीचर की कथित तौर पर पीट-पीटकर हत्या के मामले पर प्रमोद तिवारी ने कहा, “मैं किरेन रिजिजू से पूछना चाहता हूं कि जब वह संघर्ष कर रहे थे, मदद मांग रहे थे और खुद को बचाने के लिए दरवाजे की ओर भाग रहे थे, तब उनकी ‘क्विक रिस्पॉन्स टीम’ कहां थी? वहां पर एक आम आदमी सुरक्षित नहीं है।”

कांग्रेस सांसद ने कहा, “क्या हमें मणिपुर के उस व्यक्ति की बेरहमी से हुई हत्या पर दुख नहीं जताना चाहिए, जिसने संगीत की दुनिया में भारत का नाम रोशन किया था? आप जश्न मनाएं, क्योंकि आपकी कोई कमजोरी होगी। लेकिन हम इस हत्या को केंद्र सरकार की कानून-व्यवस्था की पूरी विफलता मानते हैं। हमारा मानना ​​है कि भाजपा ने दिल्ली को ‘क्राइम कैपिटल’ (अपराध की राजधानी) बना दिया है।”

सत्य निकेतन में इमारत गिरने की घटना पर प्रमोद तिवारी ने कहा, “मुझे जानकारी मिली है कि दूसरी इमारतों के मालिकों से जबरन वसूली शुरू हो गई है, ताकि उनकी इमारतों की पहचान न हो या उन्हें गिराया न जाए। इसकी जांच होनी चाहिए। मैं बस इतना कहना चाहता हूं कि इन मौतों पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। मैं इसे हादसा नहीं, बल्कि हत्या मानता हूं। तीन-चार दिन बयानबाजी के बाद हर कोई आखिरकार किसी और हादसे का इंतजार करने लगता है। सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट की देखरेख में एक असरदार व लंबी अवधि की पॉलिसी लागू की जानी चाहिए।”