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सड़कों से आगे बढ़े मोनेटाइजेशन, रेल और शहरी इंफ्रा में प्राइवेट पूंजी लाना जरूरी: एनसीएईआर

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नई दिल्ली, 9 सितंबर (आईएएनएस)। भारत को रेल, शहरी और अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में प्राइवेट पूंजी लाने के लिए मोनेटाइजेशन मॉडल की जरूरत है। यह बात एनसीएईआर के डायरेक्टर जनरल सुरेश गोयल ने कही।

नई दिल्ली में सीआईआई के सालाना इंफ्रास्ट्रक्चर समिट ‘रेविटालिंसिंग प्राइवेट कैपिटल फॉर इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट’ में बुधवार को सुरेश गोयल ने कहा कि भारत की इंफ्रास्ट्रक्चर मोनेटाइजेशन स्ट्रैटेजी को सड़कों से आगे बढ़ने की जरूरत है। रेलवे, स्ट्रैटेजिक इंफ्रास्ट्रक्चर और शहरी कनेक्टिविटी में प्राइवेट कैपिटल लाने के लिए पीपीपी मोड और कंसेशन फ्रेमवर्क जैसे नए मॉडल की जरूरत है।

गोयल ने कहा कि भारत इंफ्रास्ट्रक्चर के मामले में एक स्ट्रैटेजिक मोड़ पर है। सड़क सेक्टर के मोनेटाइजेशन ने दिखाया है कि अच्छी तरह से तैयार कंसेशन फ्रेमवर्क निवेशकों को आकर्षित कर सकता है, लेकिन इस मॉडल को अन्य सेक्टर में अभी तक सफलतापूर्वक नहीं अपनाया गया है।

उन्होंने एनएचएआई के कंसेशन फ्रेमवर्क का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि हाईवे प्रोजेक्ट में सबसे बड़ा जोखिम प्रतिस्पर्धी रूट के आने से रेवेन्यू कम होना है। इसके लिए मौजूदा फ्रेमवर्क में टारगेट रेवेन्यू तय किया जाता है। अगर वास्तविक रेवेन्यू कम रहता है तो कंसेशन अवधि बढ़ा दी जाती है और ज्यादा होने पर अवधि घटा दी जाती है। इस मॉडल को ग्लोबल निवेशकों ने अपनाया है और इसने एनएचएआई एसेट्स के मोनेटाइजेशन में काफी मदद की है। उन्होंने कहा कि अब चुनौती इस सफल फ्रेमवर्क को रेलवे और अन्य सेक्टर में लागू करने की है।

समिट में नीति आयोग में पीपीपी प्रोग्राम डायरेक्टर पार्थ सारथी रेड्डी ने कहा कि पीपीपी इकोसिस्टम हाईवे, पोर्ट और एविएशन से आगे बढ़कर रेलवे, हेल्थकेयर, सॉलिड वेस्ट और वॉटरवेज जैसे क्षेत्रों में फैल रहा है। हर एसेट की विशेषता और रिस्क प्रोफाइल के आधार पर सही पीपीपी मॉडल तय करना होगा।

सीआईआई इंफ्रास्ट्रक्चर काउंसिल के चेयरमैन बीवीएन राव ने कहा कि पिछले तीन दशकों से पीपीपी का मतलब पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप है, लेकिन भविष्य के लिए इसका मतलब दृढ़ता, धैर्य और लगन होना चाहिए। उन्होंने कहा कि हर देरी वाला प्रोजेक्ट सिर्फ देरी वाली संपत्ति नहीं, बल्कि रुकी हुई नौकरियां और धीमी प्रगति है। अगर प्राइवेट कैपिटल चाहिए तो प्रोजेक्ट को पूरा करना उतना ही जरूरी है जितना आइडिया सोचना।

सीआईआई की पीपीपी पर नेशनल कमिटी के चेयरमैन विनायक चटर्जी ने दो बड़ी रुकावटें गिनाईं। पहली, भरोसेमंद और पर्याप्त शवल-रेडी प्रोजेक्ट पाइपलाइन का न होना। अगले पांच साल के लिए आज लगभग 45.6 लाख करोड़ रुपए की पाइपलाइन की जरूरत है। दूसरी, प्राइवेट सेक्टर के लिए समान अवसर न होना।

उन्होंने 8 सुधार सुझाए, जिसमें ‘3पी इंडिया’ को संस्थागत रूप देना, स्वतंत्र सेक्टर रेगुलेटर, एनएबीएफआईडी को मेगा-प्रोजेक्ट्स का ढांचा तैयार करने की जिम्मेदारी, प्लग-एंड-प्ले मॉडल और अलग इंफ्रास्ट्रक्चर फंड बनाना शामिल है।