नई दिल्ली, 9 सितंबर (आईएएनएस)। 10 सितंबर भारतीय सैन्य इतिहास में वीरता, बलिदान और अदम्य साहस के प्रतीक कंपनी क्वार्टर मास्टर हवलदार अब्दुल हमीद की शहादत का दिन है। 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में उन्होंने जिस बहादुरी का परिचय दिया, उसने उन्हें देश के महानतम युद्ध नायकों में शामिल कर दिया। यही वजह है कि शहादत के इतने दिनों बाद भी उन्हें याद किया जाता है।
अब्दुल हमीद दुश्मन के आधुनिक पैटन टैंकों के सामने अद्भुत साहस दिखाते हुए उन्होंने अपने प्राणों की आहुति दे दी, लेकिन भारतीय सेना का मनोबल ऊंचा रखा।
अब्दुल हमीद का जन्म 1 जुलाई 1933 को उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के धामूपुर गांव में हुआ था। उनके पिता मोहम्मद उस्मान पेशे से दर्जी थे और माता का नाम सकीना बेगम था। साधारण परिवार में जन्मे अब्दुल हमीद ने बचपन से ही साहस, अनुशासन और देशभक्ति की भावना को अपनाया।
अब्दुल हमीद ने 27 दिसंबर 1954 को भारतीय सेना की ग्रेनेडियर्स रेजिमेंट ज्वॉइन की। बाद में उन्हें 4 ग्रेनेडियर्स बटालियन में तैनात किया गया, जहां उन्होंने अपने सैन्य जीवन का अधिकांश समय बिताया।
अब्दुल हमीद का नाम 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में असल उत्तर की लड़ाई के कारण अमर हो गया। उस समय पाकिस्तान ने अमेरिकी निर्मित अत्याधुनिक पैटन टैंकों के साथ बड़ा हमला किया था।
युद्ध के दौरान अब्दुल हमीद ने अपनी रिकॉइललेस गन से दुश्मन के कई टैंकों को निशाना बनाकर तबाह कर दिया। उन्होंने लगातार एक के बाद एक पाकिस्तानी टैंकों को नष्ट किया और दुश्मन की प्रगति रोक दी। भारतीय सेना के अनुसार, उन्होंने सात से आठ दुश्मन टैंकों को ध्वस्त किया था, जो युद्ध की दिशा बदलने वाली कार्रवाई मानी जाती है।
असाधारण शौर्य और सर्वोच्च बलिदान के लिए अब्दुल हमीद को मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया, जो भारत का सर्वोच्च सैन्य वीरता पुरस्कार है। यह सम्मान 26 जनवरी 1966 को उनकी पत्नी रसूलन बीबी को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने प्रदान किया था।
इसके अलावा उन्हें परमवीर चक्र (मरणोपरांत), समर सेवा पदक, रक्षा पदक और सैन्य सेवा पदक से भी सम्मानित किया गया।
10 सितंबर 1965 को पंजाब के खेमकरण सेक्टर में असल उत्तर की लड़ाई के दौरान अब्दुल हमीद दुश्मन के टैंकों को निशाना बना रहे थे। तभी पाकिस्तानी टैंक से दागा गया गोला उनकी आरसीएल गन से लैस जीप पर आकर लगा। गंभीर रूप से घायल होने के बाद उन्होंने रणभूमि में ही वीरगति प्राप्त की।
उनकी शहादत ने भारतीय सैनिकों में नया जोश भर दिया और अंततः पाकिस्तान की टैंक रेजिमेंट को भारी नुकसान उठाना पड़ा। असल उत्तर की लड़ाई को भारतीय सेना की सबसे बड़ी जीतों में गिना जाता है।
अब्दुल हमीद केवल एक सैनिक नहीं, बल्कि साहस, कर्तव्यनिष्ठा और राष्ट्रभक्ति का प्रतीक हैं। सीमित संसाधनों के बावजूद आधुनिक टैंकों का सामना कर उन्होंने साबित किया कि युद्ध केवल हथियारों से नहीं, बल्कि हौसले और रणनीति से भी जीता जाता है।
