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बाबा हरभजन सिंह: भारतीय सेना का एक अदृश्य सैनिक जो करता रहा देश की पहरेदारी, चीनी सेना भी झुकाती है सिर

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नई दिल्ली, 10 सितंबर (आईएएनएस)। एक सैनिक जिसकी शहादत 1968 में हो चुकी है, उसके बावजूद वो भारत की सीमा की सुरक्षा करता है। यह सिर्फ आम लोगों की धारणा नहीं है बल्कि भारतीय सेना के साथ-साथ चीन की सेना का भी विश्वास है। यह कहानी है भारतीय सेना के एक सम्मानित सिपाही बाबा हरभजन सिंह की।

बाबा हरभजन सिंह, जिन्हें उनके साथी सैनिक प्यार से ‘बाबा’ कहते थे, भारतीय सेना की 23वीं पंजाब रेजिमेंट में एक सैनिक के रूप में कार्यरत थे। पंजाब के एक छोटे से गांव में जन्मे बाबा हरभजन सिंह ने 11 सितंबर 1968 में नाथू ला दर्रे के पास रहस्यमय परिस्थितियों में अपनी जान गंवा दी। उनकी खूब तलाश की गई लेकिन वो नहीं मिले। कहते हैं कि तीन दिन बाद वह अपने एक साथी के सपने में आए। हरभजन सिंह ने अपने साथी को अपनी मृत्यु की सूचना दी।

भारतीय सेना के प्रमुख रह चुके एमएम नरवणे ने भी अपनी किताब ‘द क्यूरियस एंड द क्लासिफाइड: अनअर्थिंग मिलिट्री मिथ्स एंड मिस्ट्रीज’ में इसका जिक्र किया है। इस बारे में वे अपने एक इंटरव्यू में कहते हैं, “हरभजन सिंह सामान्य गश्त के दौरान शहीद हुए थे। बाद में उनका शव नहीं मिला था। बाद में एक सैनिक के सपने में बाबा हरभजन आते हैं और अपने शव के बारे में बताते हैं। जब तलाशी ली जाती है तो हरभजन सिंह का शव मिला था। तब से विचार आने लगा कि वे इस तरह सपने में आ सकते हैं तो वाकई ‘बाबा’ होंगे।”

ऐसा माना जाता है कि बाबा हरभजन सिंह की आत्मा भारत-चीन सीमा के दुर्गम इलाकों में गश्त करती है, अपने साथियों की रक्षा करती है और उन्हें सुरक्षा और मार्गदर्शन प्रदान करती है। हरभजन सिंह की रेजिमेंट के साथी रहे सूबेदार मेजर (रिटायर्ड) हरबान सिंह ने एक इंटरव्यू में बताया था, “जो बटालियन जाती हैं, वो बताती हैं कि वहां की घटनाएं सच्ची हैं। बाबा हरभजन सिंह वहां गश्त करते हैं।”

सिक्किम की सरहद पर भयंकर ठंड में लंबी ड्यूटी करते हुए भी किसी जवान को झपकी नहीं लगती। कहा जाता है कि अगर किसी सैनिक को गलती से झपकी लग भी जाए तो उसे बाबा का थप्पड़ पड़ जाता है। कहानी महज इतनी नहीं है। ऐसी किंवदंती रही हैं कि अगर चीनी घुसपैठ की कोशिश करते तो बाबा सफेद घोड़े पर सवार होकर उनका रास्ता रोक लेते हैं।

हरभजन सिंह की रेजिमेंट के साथी रहे सूबेदार (रिटायर्ड) चरनजीत लाल एक इंटरव्यू में कहते हैं, “खुद चीनी सैनिक यह मानते थे कि भारतीय सेना का कोई सैनिक सफेद घोड़े पर सवार होकर रात के समय घूमता है। चीनी सैनिक इस बारे में भारतीय सैनिकों से शिकायत करते थे। फिर बाबा हरभजन सिंह के बारे में चीनी सैनिकों को बताया गया, जिसके बाद चीनी सैनिक भी उन्हें मानने लगे।”

बाबा हरभजन सिंह की मौजूदगी का एहसास इस कदर रहा कि लंबे समय तक चीन के साथ फ्लैग मीटिंग में उनके लिए एक खाली कुर्सी रख दी जाती थी। धीरे-धीरे भारतीय सेना में बाबा हरभजन सिंह का प्रमोशन, सैलरी और छुट्टियां तक सेना के नियमों के अनुसार होने लगीं। हरभजन सिंह जब अपने गांव लौटते तो ट्रेन में उन्हें लाया जाता। यहां तक कि ट्रेन में उनके लिए रिजर्वेशन कराया जाता था।

महज इतना नहीं, बाबा हरभजन सिंह का बंकर आज भी वैसे ही है। एमएम नरवणे बताते हैं, “लंबे अरसे के बाद भी बाबा हरभजन सिंह का बंकर बगैरह वैसे के वैसे ही रखा है। उनका वो बंकर सिक्किम में काफी ऊंचाई पर है। वहां आम पर्यटकों के लिए 50 कदम आगे जाना भी बहुत मुश्किल होता है।”

इसी तरह बाबा हरभजन सिंह के असमय निधन के बाद उनके साथी सैनिकों और श्रद्धालुओं ने अलग-अलग रूपों में उनकी उपस्थिति को महसूस किया, जिससे उनकी स्मृति में एक स्मारक निर्माण की प्रेरणा मिली। बाबा हरभजन सिंह स्मारक का उद्घाटन 1983 में गंगटोक, सिक्किम स्थित चांगू झील (त्सोंगो झील) के निकट किया गया, जो उनकी निःस्वार्थ सेवा और कर्तव्य के प्रति अटूट समर्पण को समर्पित है। यह स्मारक एक छोटे मंदिर के रूप में निर्मित है, जिसमें बाबा हरभजन सिंह की कांस्य प्रतिमा और एक खाली बिस्तर स्थापित है, जो उनकी दिव्य उपस्थिति का प्रतीक माना जाता है।