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फ्रीबी कल्चर पर शिवसेना (यूबीटी) ने की ट्रंप और मोदी की राजनीति की तुलना, बोले-यह लोकतंत्र के लिए खतरा

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मुंबई, 12 सितंबर (आईएएनएस)। शिवसेना (यूबीटी) ने शनिवार को चुनाव के समय मुफ्त तोहफे बांटने की बढ़ती ग्लोबल संस्कृति की कड़ी आलोचना की। पार्टी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की प्रस्तावित “ट्रंप डिविडेंड” योजना और भारत में राजनीतिक पार्टियों द्वारा शुरू की गई कल्याणकारी योजनाओं के बीच समानताएं बताईं।

पार्टी के मुखपत्र ‘सामना’ में छपे एक संपादकीय में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाले गुट ने आरोप लगाया कि अमेरिका में ट्रंप और भारत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा बढ़ावा दिए गए “मुफ्त की चीजें बांटने के कल्चर” (फ्रीबी कल्चर) ने लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर किया है और इंसानी गरिमा को नुकसान पहुंचाया है।

संपादकीय में कहा गया है कि जहां भारत में “लाडकी बहिन” और राज्यों में इसी तरह के कल्याणकारी कार्यक्रम चल रहे हैं। वहीं, अगर रिपब्लिकन कांग्रेस के दोनों सदनों पर नियंत्रण हासिल कर लेते हैं तो हर वयस्क अमेरिकी के बैंक खाते में 5,000 डॉलर जमा करने का ट्रंप का प्रस्ताव भी चुनाव के समय लुभाने वाला कदम ही है।

ठाकरे गुट के अनुसार, ट्रंप का प्रस्तावित “ट्रंप डिविडेंड” सीधे नकद ट्रांसफर के जरिए चुनावी समर्थन हासिल करने की कोशिश है। उनका तर्क है कि ऐसी योजना लागू करने से अमेरिकी खजाने पर 1 ट्रिलियन डॉलर से ज़्यादा का बोझ पड़ेगा, जबकि देश का राष्ट्रीय कर्ज पहले ही 40 ट्रिलियन डॉलर को पार कर चुका है और सालाना राजकोषीय घाटा 1.8 ट्रिलियन डॉलर है।

संपादकीय में यह भी दावा किया गया कि ट्रंप की घोषणा से उनकी अपनी पार्टी में बेचैनी पैदा हो गई है और इस प्रस्ताव के वित्तीय असर और इसे लागू करने को लेकर जताई जा रही चिंताओं की खबरों का जिक्र किया गया।

संपादकीय में कहा गया, “इस तरह की नकद मदद बांटने के लिए कांग्रेस की मंजूरी की जरूरत होगी। जैसे ही ट्रंप ने 5,000 डॉलर के भुगतान की घोषणा की, उनकी अपनी पार्टी के नेता और मंत्री हैरान रह गए। उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस ने साफ तौर पर निराशा जताई और यह कहकर बात को संभालने की कोशिश की कि पैसा सिर्फ कड़ी जांच-पड़ताल और कानूनी प्रक्रियाओं के बाद ही बांटा जाएगा, ताकि यह पक्का किया जा सके कि अमीर वयस्कों को इसका फायदा न मिले। यह उसी रणनीति को दिखाता है जिसका इस्तेमाल भारतीय सरकार करती है, पहले बड़ी-बड़ी घोषणाएं करना, फिर शर्तों और नौकरशाही की पेचीदगियों का इस्तेमाल करके उन्हें लागू करने में देरी करना।”

भारत का उदाहरण देते हुए शिवसेना (यूबीटी) ने पीएम मोदी के 2014 के उस वादे का जिक्र किया जिसमें हर भारतीय के बैंक खाते में 15 लाख रुपए जमा करने की बात कही गई थी, यह वादा अभी तक पूरा नहीं हुआ है। पार्टी ने देशभर की राज्य सरकारों द्वारा घोषित कई कल्याणकारी योजनाओं की भी आलोचना की और कहा कि ऐसे कार्यक्रमों का इस्तेमाल तेजी से चुनावी हथकंडों के तौर पर किया जा रहा है।

पार्टी ने कहा कि भारत में बेरोजगारी, महंगाई और किसानों की परेशानी जैसे अहम मुद्दे अभी भी अनसुलझे हैं, जबकि अमेरिका में भी ट्रंप प्रशासन घरेलू चुनौतियों से निपटने में नाकाम रहा है।

यह दावा करते हुए कि “मुफ्त की चीजें देने की राजनीति” एक ग्लोबल ट्रेंड बन गई है। संपादकीय में आरोप लगाया गया कि सरकारें चुनाव जीतने के लिए जनता के पैसे से दी जाने वाली मुफ्त सुविधाओं पर अधिक निर्भर हो रही हैं। इसमें यह निष्कर्ष निकाला गया कि ऐसी राजनीति, चाहे भारत में हो या अमेरिका में लोकतांत्रिक सिद्धांतों से समझौता करती है और जनता के प्रति जवाबदेही को कम करती है।

संपादकीय में दावा किया गया, “मोदी और शाह भारत में जो कर रहे हैं, ट्रंप अमेरिका में वही दोहरा रहे हैं। जनता के पैसे का इस्तेमाल करना, मुफ्त की चीजें बांटना और चुनाव जीतना।” इसमें आगे कहा गया कि भले ही लाभार्थी अलग-अलग हों, लेकिन इसके पीछे की राजनीतिक सोच एक जैसी ही है।