नई दिल्ली, 12 सितंबर (आईएएनएस)। टैरिफ और रेगुलेटरी रुकावटों के बीच श्रीलंका के पान निर्यात सेक्टर को पाकिस्तान को होने वाले शिपमेंट और डॉलर की कमाई में भारी गिरावट का सामना करना पड़ा है, जो उसका मुख्य पान बाजार है।
‘श्रीलंका गार्डियन’ की रिपोर्ट में कहा गया है कि व्यापार और कृषि एजेंसियों के बीच तालमेल की कमी से किसानों के लिए जरूरत से ज्यादा उत्पादन का जोखिम पैदा हो सकता है।
पाकिस्तान को होने वाला निर्यात 2019 में 4,387.02 मीट्रिक टन से घटकर 2024 में 2,250.99 टन रह गया, और इसी दौरान निर्यात से होने वाली कमाई 17.77 मिलियन डॉलर से गिरकर 9.27 मिलियन डॉलर हो गई।
2025 में थोड़ी रिकवरी हुई और मात्रा 3,336.18 टन तथा रेवेन्यू 13.39 मिलियन डॉलर तक पहुंच गया, लेकिन ये आंकड़े 2019 के स्तर से काफी नीचे रहे। ऐसा तब हुआ जब मुफ्त प्लांटिंग मटीरियल और इन्वेस्टमेंट सब्सिडी के जरिए 2025 तक खेती का रकबा 44 प्रतिशत बढ़कर 1,676 हेक्टेयर हो गया था।
रिपोर्ट में कहा गया, “यह खेती के रकबे और निर्यात से होने वाली कमाई के बीच एक साफ विरोधाभास को दिखाता है। इसके अलावा, 2022-2023 के दौरान अमेरिकी डॉलर में कमाई घटने के बावजूद एलकेआर (श्रीलंकाई रुपया) रेवेन्यू में जो बढ़ोतरी हुई, वह मुख्य रूप से अमेरिकी डॉलर के मुकाबले श्रीलंकाई रुपये की कीमत घटने की वजह से थी।”
निर्यातकों ने बाजार तक पहुंच खोने के बारे में श्रीलंका के वाणिज्य विभाग के सामने चिंता जताई, लेकिन निर्यात कृषि विभाग ने कहा कि उसके विकास या रिसर्च डिवीजन ने पान के निर्यात पर पाकिस्तान के टैरिफ और आयात प्रतिबंधों के असर को लेकर कोई स्टडी नहीं की है।
यह चिंता 28 जनवरी 2026 को वाणिज्य सचिव स्तर की बातचीत और 1 जुलाई, 2026 को व्यापार, निवेश और ऑटो सेक्टर पर संयुक्त कार्य समूह की चौथी बैठक के दौरान पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल के सामने भी रखी गई थी।
रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तानी पक्ष ने संबंधित ड्यूटी को धीरे-धीरे कम करने और 2030 तक इसे पूरी तरह खत्म करने की योजना के बारे में बताया।
रिपोर्ट में आग्रह किया गया है कि श्रीलंका के पान निर्यात सेक्टर को बचाने के लिए वाणिज्य विभाग और निर्यात कृषि विभाग के बीच उचित तालमेल सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
इसके अलावा, रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है, “एक्सपोर्टर्स के लिए टैरिफ से जुड़ी बाधाओं पर फील्ड स्टडी की जाए और पीएसएफटीए फ्रेमवर्क के तहत पाकिस्तान के रेगुलेटरी ड्यूटीज को 2030 तक टालने के बजाय जल्द हटाने के लिए डिप्लोमैटिक बातचीत को मजबूत किया जाए।”
