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गणपति उत्सव के दौरान जारांगे के अनशन से बिगड़ सकती है कानून-व्यवस्था: चंद्रकांत पाटिल

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पुणे, 16 सितंबर (आईएएनएस)। मराठा आरक्षण की मांग को लेकर मनोज जारांगे पाटिल के मुंबई मार्च और प्रस्तावित अनशन के बीच महाराष्ट्र के मंत्री चंद्रकांत पाटिल ने आरक्षण आंदोलन के लंबे इतिहास का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र के गठन के बाद से ही मराठा आरक्षण की मांग को लेकर संघर्ष होता रहा है। उन्होंने जारांगे पाटिल से अपील की कि वे गणपति उत्सव के दौरान मुंबई में अनशन न करें, क्योंकि इससे कानून-व्यवस्था की स्थिति प्रभावित होने की आशंका हो सकती है।

चंद्रकांत पाटिल ने कहा कि 1960 में महाराष्ट्र के गठन के बाद 1967 से मराठा आरक्षण की लड़ाई चल रही है। उन्होंने मंडल आयोग का उल्लेख करते हुए कहा कि 1980 के दशक में आयोग की सिफारिशों के बाद कई जातियों को ओबीसी सूची में शामिल किया गया। उस समय शरद पवार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री थे और मराठा समुदाय को कुनबी सूची में शामिल करने का अवसर था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसके बाद अन्नासाहेब पाटिल ने मराठा आरक्षण के लिए आंदोलन किया। इसके बावजूद मांग पूरी नहीं हुई और इसके बाद भी आरक्षण आंदोलन जारी रहा।

उन्होंने कहा कि कई मराठा नेताओं के मुख्यमंत्री रहने के बावजूद तत्कालीन सरकारों को मराठा समुदाय के लिए आरक्षण के अलग-अलग प्रावधान करने पड़े। देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व वाली सरकार ने मराठा समाज को 16 प्रतिशत आरक्षण दिया था, जिसे बाद में न्यायिक प्रक्रिया के दौरान कम किया गया। कुछ समय तक यह आरक्षण लागू रहा, लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट में इसे कायम नहीं रखा जा सका।

पाटिल ने कहा कि इसके बाद केंद्र की ओर से आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए 10 प्रतिशत ईडब्ल्यूएस आरक्षण का प्रावधान आया। एसईबीसी आरक्षण खत्म होने के बाद मराठा समाज के लोगों को पात्रता के आधार पर ईडब्ल्यूएस का लाभ मिलने लगा। बाद में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली सरकार ने फिर 10 प्रतिशत एसईबीसी आरक्षण का प्रावधान किया। इस तरह अलग-अलग समय पर मराठा समाज को एसईबीसी और ईडब्ल्यूएस के माध्यम से आरक्षण का लाभ मिलता रहा है।

कुनबी प्रमाणपत्र की मांग पर चंद्रकांत पाटिल ने कहा कि जिन लोगों के पुराने रिकॉर्ड या दस्तावेजों में कुनबी होने का प्रमाण मिलता है, उन्हीं को निर्धारित प्रक्रिया के तहत प्रमाणपत्र दिया जा सकता है। बिना दस्तावेजी आधार के बड़े पैमाने पर प्रमाणपत्र देने का फैसला न्यायिक जांच में टिकना मुश्किल होगा। कुछ पुरानी प्रविष्टियों का उदाहरण देते हुए कहा कि दस्तावेज मिलने के आधार पर प्रमाणपत्र जारी किए गए, लेकिन सत्यापन के दौरान सभी मामले टिक नहीं सके। हैदराबाद गजट के क्रियान्वयन के बाद भी जिन लोगों के नाम और रिकॉर्ड पात्रता के अनुरूप मिलेंगे, उन्हें ही इसका लाभ मिल सकेगा।

मनोज जारांगे के साथ अपने पुराने संबंधों का उल्लेख करते हुए पाटिल ने कहा कि वे उन्हें वर्ष 2014 से जानते हैं। 2014 से 2019 तक वे मराठा आरक्षण के लिए बनी कैबिनेट उपसमिति के अध्यक्ष रहे और उस दौरान नियमित रूप से मराठा नेताओं के साथ बैठकें होती थीं। जारांगे कई बार उनसे मिलते रहे और अपनी मांगें रखते रहे। मांगें रखना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन मांग ऐसी होनी चाहिए जिसका कानूनी आधार हो और जो अदालत में टिक सके। ऐसी मांगों से समाधान निकालने में मदद मिल सकती है, जबकि अदालत में टिकने की संभावना न रखने वाले फैसले लंबे समय का समाधान नहीं दे सकते।

जारांगे पाटिल के मुंबई में अनशन के फैसले पर चंद्रकांत पाटिल ने कहा कि अनशन करना उनका अधिकार है, लेकिन गणपति उत्सव के दौरान मुंबई में ऐसा करने से कानून-व्यवस्था की चुनौती पैदा हो सकती है। गणपति उत्सव के दौरान बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर निकलते हैं और पुलिस पहले से सुरक्षा व्यवस्था में व्यस्त रहती है। उन्होंने जारांगे से अपील करते हुए कहा कि वे अनशन किए बिना भी अपनी मांगों को जारी रख सकते हैं। सरकार और आंदोलनकारियों को एक-दूसरे के साथ सहयोग करना चाहिए ताकि मुंबई में किसी तरह की अव्यवस्था न हो।

जारांगे के पीछे किसी अन्य शक्ति के होने के सवाल पर पाटिल ने कहा कि वे उन्हें लंबे समय से जानते हैं और जारांगे किसी के उकसाने से आंदोलन करने वाले व्यक्ति नहीं हैं। हालांकि उन्होंने कहा कि कुछ ताकतें अलग-अलग मुद्दों के जरिए सरकार को परेशान करने की कोशिश कर सकती हैं। पाटिल ने जोर दिया कि सरकार मराठा आरक्षण से जुड़े मुद्दों पर समाधान निकालने की दिशा में प्रयास कर रही है।