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असम : मानस में ‘जंगल की थाली’ बचाने की मुहिम, बंगाल फ्लोरिकन से घासभूमि तक संरक्षण

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बक्सा (असम), 18 सितंबर (आईएएनएस)। मानस के जंगल में करीब हाथियों की चिंघाड़, खुले प्राकृतिक आवास में विचरते गैंडे और बाघों की मौजूदगी जितनी आकर्षित करती है, उससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है वह खामोश कवायद जो इनके अस्तित्व की बुनियाद बचा रही है। यहां संरक्षण सिर्फ वन्यजीवों की गिनती और निगरानी तक सीमित नहीं है, बल्कि जंगल की ‘थाली’ यानी घास, पानी और प्राकृतिक आवास को बचाने पर जोर है। दुर्लभ बंगाल फ्लोरिकन से लेकर हाथी और गैंडे तक, मानस में संरक्षण का यह जमीनी मॉडल पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को साथ लेकर आगे बढ़ रहा है।

भारत-भूटान सीमा से सटे मानस राष्ट्रीय उद्यान में वन्यजीव संरक्षण की तस्वीर जंगल के भीतर किए जा रहे छोटे-छोटे लेकिन महत्वपूर्ण प्रयासों से बनती है। हाथी, गैंडे और बाघ जैसे बड़े वन्यजीवों के साथ दुर्लभ पक्षियों और घासभूमि को बचाने के लिए वन विभाग ने संरक्षण की रणनीति को व्यापक बनाया है। पीआईबी, लखनऊ के नेतृत्व में असम के दौरे पर पहुंचे उत्तर प्रदेश के मीडिया प्रतिनिधिमंडल ने मानस राष्ट्रीय उद्यान में संरक्षण से जुड़ी गतिविधियों को करीब से देखा।

वन अधिकारियों ने बताया कि मानस में किसी एक प्रजाति को बचाने के बजाय उसके पूरे प्राकृतिक आवास और उससे जुड़े पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने पर काम किया जा रहा है। मानस में घासभूमि संरक्षण की दिशा में 16 प्रजातियों की विशेष घास की नर्सरी तैयार की जा रही है। नर्सरी में अलग-अलग प्रजातियों के लिए प्लॉट बनाए गए हैं। घास तैयार होने के बाद उसे पार्क के उन हिस्सों में लगाया जाता है, जहां घासभूमि के पुनर्जीवन की जरूरत होती है। यह पहल सीधे तौर पर शाकाहारी वन्यजीवों के भोजन से जुड़ी है।

हाथी और गैंडे जैसे वन्यजीवों के लिए घास सिर्फ वनस्पति नहीं, बल्कि उनके प्राकृतिक आवास का अहम हिस्सा है। ऐसे में घासभूमि का संरक्षण वन्यजीव संरक्षण की पहली कड़ी बन जाता है। वन अधिकारियों के मुताबिक मानस में घासभूमि का क्षेत्र हर वर्ष करीब 6.5 वर्ग किलोमीटर की दर से घट रहा है। आक्रामक वनस्पति प्रजातियों का फैलाव भी प्राकृतिक घास के मैदानों के लिए चुनौती बना हुआ है। इन्हें नियंत्रित करने के लिए यांत्रिक तरीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसके साथ ही जरूरत वाले क्षेत्रों में घासभूमि के पुनर्जीवन की योजनाबद्ध कवायद जारी है।

मानस नेशनल पार्क के डिप्टी डायरेक्टर युवराज सिंह ढींगरा ने बताया कि मानस की पहचान केवल बड़े वन्यजीवों से नहीं है। दुर्लभ बंगाल फ्लोरिकन भी यहां की जैव विविधता का महत्वपूर्ण हिस्सा है। वन अधिकारियों के अनुसार इस पक्षी के संरक्षण और उसके प्राकृतिक आवास को सुरक्षित रखने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।

उन्होंने बताया कि बंगाल फ्लोरिकन के संरक्षण के लिए मानस से उत्तर प्रदेश के दुधवा राष्ट्रीय उद्यान में इसे बसाने की दिशा में भी प्रयास किए जा रहे हैं। यह पहल बताती है कि संरक्षण का दायरा केवल करिश्माई बड़े वन्यजीवों तक सीमित नहीं, बल्कि उन दुर्लभ प्रजातियों तक भी पहुंच रहा है जिनका अस्तित्व उनके विशिष्ट आवास पर निर्भर है।

मानस राष्ट्रीय उद्यान का नाम इसके बीच से बहने वाली मानस नदी के नाम पर पड़ा है। नदियों, जंगलों और घासभूमियों का यह मेल मानस के समृद्ध पारिस्थितिकी तंत्र को आकार देता है। भारत-भूटान सीमा पर स्थित मानस की भौगोलिक स्थिति भी इसके संरक्षण को खास बनाती है। यह भूटान के रॉयल मानस नेशनल पार्क से सटा हुआ है। सीमा के दोनों ओर फैला प्राकृतिक क्षेत्र वन्यजीवों के लिए एक बड़े साझा पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा है। यही वजह है कि मानस में संरक्षण की कवायद केवल पार्क की सीमाओं तक सीमित नहीं मानी जाती।

मानस नाम को लेकर यह मान्यता भी जुड़ी है कि इसका संबंध हिंदू नाग देवी मनसा से है। प्राकृतिक विरासत और सांस्कृतिक मान्यता का यह मेल पार्क को अलग पहचान देता है। मानस के भ्रमण के दौरान असम फॉरेस्ट प्रोटेक्शन फोर्स की महिला सिपाहियों की सक्रिय भूमिका भी सामने आई। उन्होंने मीडिया प्रतिनिधिमंडल को घास की नर्सरी में तैयार किए जा रहे अलग-अलग प्लॉट, उनकी देखरेख और जंगल में इनके इस्तेमाल की प्रक्रिया के बारे में जानकारी दी।