बेंगलुरु, 22 सितंबर (आईएएनएस)। कर्नाटक उच्च न्यायालय ने मंगलवार को वरिष्ठ वकील और कार्यकर्ता गिरीश भारद्वाज द्वारा दायर जनहित याचिका (पीआईएल) पर सुनवाई की, जिसमें सरकारी कार्यक्रमों में वंदे मातरम गाने के संबंध में राज्य सरकार के फैसले को चुनौती दी गई थी।
जस्टिस अनु शिवरामन की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने मामले की सुनवाई की। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अंगद कामत उपस्थित हुए, जबकि कर्नाटक सरकार की ओर से महाधिवक्ता शशि किरण शेट्टी ने प्रतिनिधित्व किया।
याचिकाकर्ता की ओर से बहस करते हुए अंगद कामत ने तर्क दिया कि राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत से संबंधित निर्णय केंद्र सरकार द्वारा लिए जाने चाहिए और राज्य सरकारें इन्हें स्वतंत्र रूप से नहीं बदल सकतीं।
उन्होंने बताया कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत के गायन के तरीके को निर्धारित करते हुए अधिसूचनाएं जारी की हैं। याचिकाकर्ता के अनुसार, वंदे मातरम में छह श्लोक हैं और निर्धारित गायन में लगभग 3.10 मिनट लगते हैं। उन्होंने तर्क दिया कि केंद्र ने भी इस गीत के गायन के तरीके पर दिशानिर्देश जारी किए हैं।
अंगद कामत ने तर्क दिया कि वंदे मातरम के गायन को छोटा करने का राज्य मंत्रिमंडल का निर्णय प्रक्रियात्मक खामियों से ग्रस्त था। उन्होंने दावा किया कि किसी भी विभाग ने औपचारिक रूप से गीत को छोटा करने का प्रस्ताव नहीं दिया था और मंत्रिमंडल का निर्णय उचित कैबिनेट नोट या सहायक दस्तावेज के बिना लिया गया था।
उन्होंने तर्क दिया कि राष्ट्रीय प्रतीक और राष्ट्रगान सहित राष्ट्रीय प्रतीकों से संबंधित मामले केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में आते हैं और राज्य सरकारें स्वतंत्र रूप से अलग नियम नहीं बना सकतीं।
एडवोकेट जनरल शशि किरण शेट्टी ने जनहित याचिका का विरोध करते हुए इसे दायर करने की परिस्थितियों पर सवाल उठाया। उन्होंने बताया कि याचिकाकर्ता ने छुट्टी के दिन याचिका दायर की और अगले ही दिन अदालत में सुनवाई की मांग की।
शशि किरण शेट्टी ने वंदे मातरम से संबंधित सर्वोच्च न्यायालय की कार्यवाही का भी हवाला दिया और कहा कि केंद्र ने सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष कहा था कि राष्ट्रगीत गाना अनिवार्य नहीं है, जबकि राष्ट्रगान गाना अनिवार्य है।
उन्होंने तर्क दिया कि संपूर्ण वंदे मातरम गाना अनिवार्य नहीं है और 1932 से ऐसे अवसरों पर सामान्यतः केवल दो श्लोक ही गाए जाते रहे हैं।
उन्होंने केंद्र सरकार के संयुक्त सचिव द्वारा राज्यों के मुख्य सचिवों को भेजे गए एक पत्र का भी हवाला दिया, जिसमें उनके अनुसार, उन अवसरों का उल्लेख था जिन पर यह गीत गाया जा सकता था और राज्य सरकार के कार्यक्रमों में दो श्लोकों के उपयोग का भी जिक्र था।
एडवोकेट जनरल ने आगे आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता ने अपने हलफनामे में यह दावा करके गलत बयान दिया है कि वह किसी संगठन से संबद्ध नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता का एक राजनीतिक दल से संबंध है और उन्होंने दावा किया कि जनहित याचिका के पीछे राजनीतिक मकसद है।
हालांकि, अंगद कामत ने यह बात बरकरार रखी कि वंदे मातरम को राष्ट्रीय गीत के रूप में मान्यता प्राप्त है और उन्होंने तर्क दिया कि सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्धारित नहीं किया है कि कितने श्लोक गाए जाने चाहिए। उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने गीत बजाए जाने पर सम्मान दिखाने के मुद्दे पर विचार किया था, लेकिन गाए जाने वाले श्लोकों की संख्या निर्धारित नहीं की थी।
उन्होंने कहा कि केंद्र को गाए जाने वाले श्लोकों की संख्या स्पष्ट करनी चाहिए और राज्य सरकारों को उसके निर्देशों का पालन करना चाहिए। याचिकाकर्ता के अनुसार, केंद्र के निर्देश केवल सलाह मात्र नहीं थे और राज्य सरकार को उनका पालन करना आवश्यक था।
डिवीजन बेंच के समक्ष ये तर्क कर्नाटक सरकार के आधिकारिक कार्यक्रमों में वंदे मातरम के गायन संबंधी निर्णय पर चल रहे विवाद के बीच आए हैं।
उल्लेखनीय है कि केंद्रीय शिक्षा मंत्री प्रह्लाद जोशी ने चेतावनी दी थी कि वंदे मातरम के गायन को केवल दो श्लोकों तक सीमित करने के लिए भाजपा संसद में कर्नाटक सरकार के खिलाफ यह मुद्दा उठाएगी।
भाजपा और जेडी(एस) के विधायकों ने सोमवार को कर्नाटक विधानसभा के भीतर वंदे मातरम का पूर्ण संस्करण गाया, जो राज्य सरकार के दो श्लोकों तक गायन को सीमित करने के निर्देश का उल्लंघन था।
