मुंबई, 25 सितंबर (आईएएनएस)। शिवसेना (यूबीटी) ने शुक्रवार को कहा कि महाराष्ट्र सूखे से जूझ रहा है। मानसून के पीक सीजन में बारिश न होने से मराठवाड़ा, पश्चिमी महाराष्ट्र और विदर्भ के बड़े हिस्से में फसलें बर्बाद हो गई हैं।
पार्टी के मुखपत्र ‘सामना’ में संपादकीय के जरिए ठाकरे गुट ने राज्य सरकार से नौकरशाही के नियमों को दरकिनार कर, बिना शर्त खजाना खोलने और तुरंत सूखा आपातकाल घोषित करने की मांग की है।
एल नीनो के गंभीर प्रभाव के कारण सोलापुर, अहिल्यानगर और मराठवाड़ा तथा पश्चिमी विदर्भ के कई जिलों में हफ्तों और कहीं-कहीं दो महीने तक एक बूंद भी बारिश नहीं हुई है। सोयाबीन, कपास, तुअर, मूंग, उड़द, ज्वार और मक्का की खड़ी फसलें सूखकर नष्ट हो गई हैं। कुएं या सिंचाई सुविधा वाले किसानों को भी 50 से 70 प्रतिशत तक पैदावार कम होने की आशंका है, जबकि बारिश पर निर्भर किसानों की फसल पूरी तरह बर्बाद हो गई है।
संपादकीय के अनुसार, यह संकट खरीफ और आने वाले रबी दोनों सीजन को प्रभावित करेगा। बारिश के मौसम के बीच में ही कुएं, तालाब और बोरवेल समय से पहले सूख रहे हैं, जिससे किसानों के पास अगली बुवाई के लिए पानी ही नहीं बचा है और पूरे साल की आजीविका खतरे में है।
संपादकीय में कार्रवाई में देरी को लेकर राज्य नेतृत्व पर भी निशाना साधा गया है। पड़ोसी राज्य कर्नाटक की तुलना करते हुए कहा गया है कि कर्नाटक ने हफ्तों पहले ही सूखा घोषित कर राहत उपाय शुरू कर दिए थे, जबकि महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री और मंत्री लौटते मानसून का इंतजार कर रहे हैं।
संपादकीय में कहा गया, “हालांकि मुख्यमंत्री और सरकारी अधिकारी हाल ही में जमीनी हकीकत का जायजा लेने के लिए खेतों का दौरा करने लगे हैं, लेकिन औपचारिक सर्वे, पंचनामे और मंत्रियों की समीक्षा बैठकों से तत्काल राहत में देरी नहीं होनी चाहिए।”
प्रकृति की मार के अलावा किसान बाजारों में भी लूट का शिकार हो रहे हैं। संपादकीय में परभणी जिले के सैलू तालुका की एक घटना का जिक्र किया गया, जहां जीवन कावड़े नाम के किसान ने सूखे के बावजूद चार क्विंटल मिर्च की खेती की। व्यापारियों ने उसकी पूरी उपज के लिए सिर्फ 1,017 रुपए दिए, जबकि सिर्फ कटाई मजदूरी पर ही 2,000 रुपए खर्च हुए थे, बीज, खाद और परिवहन का खर्च अलग था।
संपादकीय में नेताओं से एपीएमसी बाजारों का दौरा करने और संकटग्रस्त किसानों का शोषण करने वाले बिचौलियों पर कार्रवाई करने की मांग की गई। और कहा गया कि मौजूदा स्थिति लाखों किसान परिवारों के लिए जीवन-मरण का सवाल है। सरकार को महाराष्ट्र के किसानों के लिए खजाना खोलना चाहिए और सख्त नियमों में ढील देनी चाहिए।
