नई दिल्ली, 26 सितंबर (आईएएनएस)। योग केवल शरीर को लचीला बनाने की क्रिय नहीं है, बल्कि यह मन और आत्मा को संतुलित करने का एक प्राचीन मार्ग है। भारतीय योग परंपरा में अष्टावक्रासन एक ऐसा योगासन है, जो बाजुओं में मजबूती, पेट की मांसपेशियों में कसाव और मानसिक स्थिरता लाने के लिए जाना जाता है।
महर्षि अष्टावक्र के नाम पर रखा गया यह आसन दिखने में भले ही कठिन लगे, लेकिन नियमित अभ्यास से यह शरीर को नई ऊर्जा और संतुलन प्रदान करता है। ‘अष्टावक्र ‘ का शाब्दिक अर्थ है ‘आठ वक्रता’, जो उनके शरीर में मौजूद आठ विकृतियों से संबंधित है। अगला शब्द ‘ आसन ‘ है, जिसका अर्थ है आसन या मुद्रा। इस आसन के नियमित अभ्यास से बांहों, कलाई, कंधों, नितंबों और कोर की मांसपेशियों मजबूत बनती है।
आयुष मंत्रालय के अनुसार, अष्टावक्रासन एक उच्च स्तरीय आर्म-बैलेंसिंग योगासन है। यह आसन महान ऋषि अष्टावक्र को समर्पित है। इस आसन के सही अभ्यास के लिए शारीरिक संतुलन, हाथों की मजबूती और कोर स्टेबिलिटी की आवश्यकता होती है।
अष्टावक्रासन या आठ-कोणीय आसन, एक आधुनिक भुजा संतुलन योगासन है। इस आसन में शरीर को भुजाओं पर कुछ सेकंड के लिए भी संतुलित रखने के लिए कोर, पीठ और भुजाओं में अत्यधिक शक्ति की आवश्यकता होती है।
अष्टकोण आसन के अभ्यास के दौरान, साधक की भुजाएं चतुरंग आसन की तरह मुड़ी हुई होती हैं और शरीर एक समय में एक भुजा पर संतुलित रहता है। साथ ही यह आसन मन और मांसपेशियों के बीच संबंध स्थापित करने के लिए उत्तम है और पूरे शरीर को सुडौल बनाने में मदद करता है। नए अभ्यासकर्ता इस आसन को करने से दौरान किसी विशेषज्ञ की सहायता लें।
आयुष मंत्रालय के सामान्य योग दिशा-निर्देशों के अनुसार, अगर किसी भी व्यक्ति की कलाई, कंधे, कोहनी या पीठ में गंभीर चोट या दर्द हो, तो वे इसे करने से परहेज करें। साथ ही, गर्भावस्था के दौरान महिलाएं इस आसन का अभ्यास न करें। हर्निया या कार्पल टनल सिंड्रोम से पीड़ित व्यक्ति इसके अभ्यास से दूर रहें।
