वाराणसी, 27 सितंबर (आईएएनएस)। पितृ पक्ष पर काशी के प्रसिद्ध पिशाचमोचन कुंड पर श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ा। पितृ पक्ष के पहले दिन से ही देश के कोने-कोने से आए लोग अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति, पितृ ऋण से मुक्ति और मोक्ष की कामना के लिए यहां तर्पण और पिंडदान करते नजर आए। मान्यता है कि इस कुंड पर पिंडदान करने से पितरों को प्रेत योनि से मुक्ति मिलती है और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है।
पिशाचमोचन कुंड परिसर में सुबह से ही श्रद्धालुओं की भीड़ लगी है। लोगों ने वैदिक मंत्रोच्चार के बीच अपने पितरों का तर्पण किया, पिंडदान किया और ब्राह्मणों को भोजन कराकर दान-पुण्य कर रहे हैं।
इस दौरान पुजारी नीरज कुमार ने आईएएनएस से बात करते हुए बताया, “इस बार पितृ पक्ष चौदह दिन का है, लेकिन सामान्य तौर पर यह पंद्रह दिन का होता है। कल श्राद्ध पूर्णिमा थी और आज से पितृ पक्ष का पहला दिन शुरू हुआ है, जिसे प्रतिपदा श्राद्ध कहा जाता है। यह दिन पितरों को समर्पित है। आज के दिन श्रद्धालु अपने पूर्वजों के नाम का श्राद्ध, पिंडदान और ब्राह्मण भोजन कराते हैं।”
उन्होंने पिशाचमोचन कुंड के महत्व के बारे में बताते हुए बताया कि काशी को मोक्ष की नगरी कहा जाता है। कहावत है – ‘मरने को देश है, तरने को काशी’। काशी में मरने वाले को तो मोक्ष मिलता ही है, लेकिन जो काशी के बाहर मृत्यु को प्राप्त होते हैं, उनकी मुक्ति के लिए पिशाचमोचन कुंड है। मान्यता है कि यहां पर आकर यदि कोई अपने पितरों का पिंडदान और तर्पण करता है, तो उन्हें भी मुक्ति मिल जाती है। यह व्यवस्था स्वयं परमेश्वर महादेव द्वारा बनाई गई है।
आज के दौर में ऑनलाइन श्राद्ध की बढ़ती परंपरा पर पुजारी नीरज कुमार ने कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि पितृ पक्ष में दान-पुण्य का विशेष फल मिलता है, लेकिन श्राद्ध हमेशा अपने हाथों से ही करना चाहिए।
उन्होंने कहा, “आजकल लोग ऑनलाइन श्राद्ध की व्यवस्था करने लगे हैं, लेकिन ऑनलाइन श्राद्ध नहीं होना चाहिए। जैसे मैं ऑनलाइन भोजन नहीं कर सकता, वैसे ही ऑनलाइन श्राद्ध भी नहीं हो सकता। श्राद्ध का अर्थ है पितरों को भोजन देना और भोजन हमेशा अपने हाथ से ही दिया जाता है।”
उन्होंने श्रद्धालुओं को सलाह देते हुए कहा कि यदि किसी कारणवश वे पिशाचमोचन या गया जैसे तीर्थ स्थलों पर नहीं आ सकते, तो उन्हें अपने आस-पास के किसी मंदिर या शिवालय में जाकर ब्राह्मणों को दान देना चाहिए, भोजन कराना चाहिए और तर्पण करना चाहिए। उन्होंने कहा, “ऑनलाइन श्राद्ध से बचना चाहिए और पितरों की मुक्ति के लिए साक्षात ब्राह्मण भोजन कराना ही सबसे उत्तम है।”
जब उनसे पूछा गया कि क्या कोई भक्त उनसे ऑनलाइन श्राद्ध की मांग को लेकर आया है, तो उन्होंने बताया कि जो भी भक्त ऐसी मांग लेकर आते हैं, वे उन्हें सीधे मना कर देते हैं।
उन्होंने कहा, “श्राद्ध के लिए ऑनलाइन व्यवस्था न करें। यह हमारे सनातन धर्म का मजाक बनाना है। आज श्राद्ध ऑनलाइन हो रहा है, दर्शन ऑनलाइन हो रहे हैं, यह गलत है। इस परंपरा को रोकना जरूरी है।”
