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पितृपक्ष विशेष: बोधगया में बुद्ध मंदिर परिसर में भी होता है पिंडदान, वर्षों पुरानी परंपरा आज भी कायम

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बोधगया, 27 सितंबर (आईएएनएस)। बिहार के गया जिले में स्थित बोधगया दुनिया भर में भगवान बुद्ध की ज्ञानस्थली और यूनेस्को विश्व धरोहर महाबोधि मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि बोधगया का पितृपक्ष और श्राद्धकर्म की परंपरा से भी गहरा संबंध है। सनातन परंपरा के अनुसार यहां पितृ तर्पण और पिंडदान का विशेष महत्व माना जाता है और पितृपक्ष के दौरान देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए यहां पहुंचते हैं।

हिंदू धार्मिक मान्यताओं में भगवान बुद्ध को भगवान विष्णु का नौवां अवतार माना गया है। यही कारण है कि महाबोधि मंदिर परिसर में वर्षों से पिंडदान और तर्पण की परंपरा चली आ रही है। पितृपक्ष के दौरान प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर परिसर, मुचलिंद सरोवर और आसपास के पवित्र स्थलों पर वैदिक विधि-विधान के साथ श्राद्ध और पिंडदान करते हैं।

धार्मिक ग्रंथों और स्थानीय परंपराओं के अनुसार बोधगया में तीन प्रमुख पिंडवेदी का विशेष महत्व है- धर्मारण्य, मातंगवापी और सरस्वती। माना जाता है कि इन स्थलों पर पिंडदान करने से पितरों को तृप्ति प्राप्त होती है। स्कंद पुराण में सरस्वती पिंडवेदी के समीप स्थित मुहाने नदी में तर्पण का विधान भी वर्णित है, इसलिए पितृपक्ष में यहां विशेष धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराए जाते हैं।

महाबोधि मंदिर परिसर में पिंडदान की परंपरा भी काफी पुरानी मानी जाती है। स्थानीय जानकार बताते हैं कि 1980 के दशक से पहले निरंजना नदी पर पुल नहीं होने के कारण श्रद्धालु धर्मारण्य, मातंगवापी और सरस्वती वेदी पर कर्मकांड पूरा करने के बाद महाबोधि मंदिर पहुंचकर पिंडदान की अंतिम प्रक्रिया संपन्न करते थे। इसके बाद वे भगवान बुद्ध के दर्शन करते और पवित्र बोधिवृक्ष को नमन कर अपने धार्मिक अनुष्ठान का समापन करते थे। यह परंपरा आज भी अनेक श्रद्धालुओं द्वारा निभाई जाती है।

पितृपक्ष के दौरान बोधगया का धार्मिक वातावरण पूरी तरह बदल जाता है। सुबह से शाम तक मंदिर परिसर और आसपास के घाटों पर वैदिक मंत्रोच्चार गूंजता रहता है। विभिन्न राज्यों से आए पुरोहित श्रद्धालुओं को विधि-विधान के अनुसार पिंडदान और तर्पण कराते हैं। मान्यता है कि गया और बोधगया में किए गए श्राद्ध से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है और परिवार पर उनका आशीर्वाद बना रहता है।

धार्मिक दृष्टि से गया और बोधगया एक-दूसरे के पूरक माने जाते हैं। जहां गया का विष्णुपद मंदिर पिंडदान का प्रमुख केंद्र है, वहीं बोधगया में बुद्ध की ज्ञानभूमि पर पितृ तर्पण की परंपरा सनातन और बौद्ध विरासत के अद्भुत संगम का प्रतीक मानी जाती है। यही वजह है कि कई श्रद्धालु विष्णुपद मंदिर में पिंडदान करने के बाद बोधगया पहुंचकर महाबोधि मंदिर में दर्शन और तर्पण करते हैं।

हालांकि, महाबोधि मंदिर परिसर में पिंडदान की परंपरा को लेकर अतीत में विवाद भी सामने आया था। 1990 के दशक में अखिल भारतीय महाबोधि महाविहार मुक्ति आंदोलन समिति ने मंदिर परिसर में पिंडदान पर रोक लगाने की मांग की थी। समिति का तर्क था कि मंदिर परिसर में इस तरह के कर्मकांड नहीं होने चाहिए। लेकिन तत्कालीन मंदिर प्रबंधन ने इस मांग को स्वीकार नहीं किया और वर्षों से चली आ रही धार्मिक परंपरा को जारी रखा। इसके बाद भी मंदिर परिसर में पिंडदान की प्रक्रिया निरंतर चलती रही।

पितृपक्ष के अवसर पर बोधगया में प्रशासन की ओर से भी विशेष व्यवस्थाएं की जाती हैं। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए सुरक्षा, यातायात, पेयजल, स्वास्थ्य और पूजा स्थलों पर अतिरिक्त इंतजाम किए जाते हैं। बड़ी संख्या में आने वाले तीर्थयात्रियों को विभिन्न पिंडवेदी और तर्पण स्थलों तक पहुंचाने के लिए विशेष मार्गदर्शन की व्यवस्था भी रहती है।

धार्मिक आस्था, सनातन परंपरा और भगवान बुद्ध की ज्ञानभूमि का संगम बोधगया को पितृपक्ष के दौरान एक विशिष्ट तीर्थ के रूप में स्थापित करता है।