नई दिल्ली, 1 अक्टूबर (आईएएनएस)। भारत के लिए 2 अक्टूबर की तारीख राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती का दिन है, लेकिन पूरी दुनिया के लिए यह उस विचार को याद करने का अवसर है, जिसने संघर्ष के बीच भी शांति, संवाद और अहिंसा का रास्ता दिखाया। गांधी जयंती और अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस का एक ही दिन पड़ना इस तारीख को एक अनूठा महत्व देता है। एक तरफ यह भारत की राष्ट्रीय स्मृति से जुड़ा दिन है, तो दूसरी तरफ संयुक्त राष्ट्र के माध्यम से यह मानवता के लिए एक सार्वभौमिक संदेश बन चुका है।
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व किया और अहिंसा के दर्शन को अपनी विचारधारा और रणनीति का आधार बनाया। देखते ही देखते गांधी का नाम शांति और मानवतावाद की एक ऐसी आवाज के रूप में उभरा, जिसे आज भी याद किया जाता है। अहिंसा के इसी विचार को वैश्विक स्तर पर पहचान उस समय मिली, जब संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 15 जून 2007 को प्रस्ताव पारित किया। इसी प्रस्ताव के जरिए 2 अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया। इस प्रस्ताव का उद्देश्य अहिंसा के संदेश का प्रसार करना था।
इस प्रस्ताव को व्यापक अंतरराष्ट्रीय समर्थन मिला। महासभा के 140 से अधिक देशों ने इसे सह-प्रायोजित किया। भारत की ओर से तत्कालीन विदेश राज्य मंत्री आनंद शर्मा ने प्रस्ताव पेश किया और इस प्रस्ताव को बिना मतदान के सर्वसम्मति से पारित किया गया।
संयुक्त राष्ट्र के इस संकल्प में अहिंसा के सिद्धांत की सार्वभौमिक प्रासंगिकता और शांति, सहिष्णुता, समझ और अहिंसा की संस्कृति को सुनिश्चित करने की इच्छा को रेखांकित किया गया। यानी गांधी का विचार दुनिया के सामने एक ऐसे सिद्धांत के रूप में रखा गया, जिसका संबंध मानव समाज के व्यापक भविष्य से है। महात्मा गांधी के लिए अहिंसा केवल एक विचार नहीं थी, बल्कि संघर्ष का एक रास्ता थी। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में उन्होंने इसी नीति के जरिए शांति के संदेश को आगे बढ़ाया।
गांधी के विचारों की व्यापकता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि संयुक्त राष्ट्र में उनके संदेश को आज की वैश्विक परिस्थितियों से जोड़कर याद किया जाता है। वहां होने वाले कार्यक्रमों और महासचिव के वक्तव्यों में गांधी के दर्शन को दुनिया के मौजूदा संघर्षों के संदर्भ में रखा जाता है। इन संदेशों में यह बात सामने आती है कि सत्य और अहिंसा में गांधी का विश्वास किसी भी हथियार से कहीं अधिक शक्तिशाली माना गया।
भारत में 2 अक्टूबर का दिन गांधी जयंती के रूप में मनाया जाता है। राजघाट पर श्रद्धांजलि, सांस्कृतिक और शैक्षिक कार्यक्रमों के साथ गांधीजी के आदर्शों को रेखांकित करने वाले जन-अभियान इस दिन का हिस्सा होते हैं। 2 अक्टूबर का संदेश सिर्फ गांधी को याद करने तक सीमित नहीं है। यह उनके विचारों को सार्वजनिक जीवन और सामाजिक अभियानों के जरिए जीवंत रखने का अवसर भी बनता है।
गांधी जयंती और अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस की सबसे खास बात यही है कि एक ही दिन राष्ट्रीय श्रद्धांजलि और वैश्विक संदेश का रूप ले लेता है। भारत में गांधी की स्मृति से जुड़ा यह दिन संयुक्त राष्ट्र के जरिए दुनिया के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचता है। बेल्जियम, अमेरिका, स्पेन, सर्बिया, स्विट्जरलैंड, थाईलैंड, कजाकिस्तान और नीदरलैंड जैसे देशों में भी इस अवसर पर स्मरणोत्सव आयोजित किए जाते हैं।
अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस का मूल संदेश यही है कि संघर्ष का जवाब हमेशा संघर्ष नहीं होना चाहिए। शांति, सहिष्णुता, समझ और संवाद को सामाजिक जीवन का हिस्सा बनाने की जरूरत है। संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव ने भी शिक्षा और जन-जागरूकता के जरिए अहिंसा के संदेश को व्यापक बनाने पर जोर दिया। महात्मा गांधी को दुनिया न केवल अहिंसा और मानवतावाद के प्रति उनके अटूट समर्पण के लिए याद करती है, बल्कि एक ऐसे आदर्श के रूप में भी देखती है, जिसके आधार पर सार्वजनिक जीवन, राजनीतिक विचारों, सरकारी नीतियों और साझा भविष्य की उम्मीदों को परखा जा सकता है।
2 अक्टूबर की अहमियत सिर्फ इसलिए नहीं है कि यह गांधी का जन्मदिन है। यह उस विचार को दोहराने का दिन भी है, जो कहता है कि दुनिया की दिशा हिंसा से नहीं, बल्कि शांति और अहिंसा से तय हो सकती है। अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस एक ओर गांधी को श्रद्धांजलि है तो दूसरी ओर पूरी दुनिया के लिए यह याद दिलाने वाला दिन है कि संघर्ष के बीच भी संवाद की गुंजाइश रहती है।
