संयुक्त राष्ट्र, 2 अक्टूबर (आईएएनएस)। दुनिया भर के राजनयिकों ने महात्मा गांधी की जयंती पर उनके संदेश को याद करते हुए समकालीन वैश्विक चुनौतियों से निपटने की बात कही और बताया कि कैसे उनके आदर्श उनके संबंधित क्षेत्रों में गूंजे हैं।
मोरक्को के स्थायी प्रतिनिधि उमर हिलाले ने यहां अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस के एक कार्यक्रम में कहा, “अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने उनके जन्मदिन पर अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस मनाकर उनकी विरासत को सभी लोगों के लिए एक साझा धरोहर बनाने का फैसला किया है।”
उन्होंने कहा, “उनकी समझ में, अहिंसा एक सक्रिय शक्ति है। यह अनुशासन, साहस और दूसरे की मानवता में अटूट विश्वास की मांग करती है।”
हिलाले ने कहा कि मोरक्को, जहां विभिन्न धर्म और संस्कृतियां आपस में मिल-जुलकर रहती हैं, वहां राजा मोहम्मद छठे ने हमेशा संयम, सहिष्णुता और शांतिपूर्ण संवाद के रास्ते को अपनाया है।
भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश ने गांधीवादी सिद्धांतों के व्यावहारिक अनुप्रयोग का एक समकालीन उदाहरण देते हुए घायल पायलट स्मित मच्छार का जिक्र किया, जिन्होंने अहिंसा के माध्यम से फ्लाईदुबई एयरलाइंस की उड़ान में यात्रियों की जान बचाई।
उन्होंने याद दिलाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि पायलट ‘अहिंसा के सिद्धांत का सच्चा प्रतीक’ हैं।
हरीश ने कहा कि पीएम मोदी ने कहा था कि हमले के बावजूद पायलट ने ‘न केवल इसे सहन किया, बल्कि बहादुरी और साहस दिखाते हुए यह सुनिश्चित किया कि उड़ान सुरक्षित गंतव्य तक पहुंचे और उनकी जिम्मेदारी में सभी यात्री सुरक्षित रहें।’
चाकू से घायल होने के बावजूद, मच्छर ने कॉकपिट का दरवाजा खोल दिया ताकि यात्री उस सह-पायलट पर काबू पा सकें, जिसने आतंकी अपहरण की कोशिश में उन पर हमला किया था।
महासभा ने 2007 में 141 देशों द्वारा प्रायोजित एक प्रस्ताव के जरिए 2 अक्टूबर को गांधी जयंती को अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस के रूप में घोषित किया था। स्मृति कार्यक्रम से पहले, हरीश ने संयुक्त राष्ट्र परिसर में गांधी की प्रतिमा पर फूल अर्पित किए।
उरुग्वे की स्थायी प्रतिनिधि लौरा डुप्यू लासेरे ने बताया कि कैसे दक्षिण अमेरिका में गांधी के संदेश को अपनाया गया।
उन्होंने कहा कि यह संदेश “अर्जेंटीना और उरुग्वे में तानाशाही के दौर में भी प्रासंगिक रहा, जब दादियां अपने जबरन गायब किए गए बच्चों और पोते-पोतियों की तलाश में मानवीय संकट से जूझ रही थीं।”
लातिन अमेरिका के उन देशों में जो क्रूर तानाशाही के जख्म झेल चुके हैं, माताओं और दादियों ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर अपने उन प्रियजनों का पता लगाने की कोशिश की है, जिन्हें सैन्य शासनों ने छीन लिया था और जिनका फिर कभी पता नहीं चला, साथ ही उन्होंने मानवाधिकारों की भी वकालत की।
संयुक्त राष्ट्र में विकासशील देशों के समूह जी77 की अध्यक्ष भी रहीं लासेरे ने कहा, “गांधी ने दिखाया कि अहिंसा कमजोरी या निष्क्रियता का प्रतीक नहीं, बल्कि साहस की अभिव्यक्ति है।”
