नई दिल्ली, 4 अक्टूबर (आईएएनएस)। भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने रविवार को अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता की तुलना संतुलित और अनुकूल माहौल से की।
विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में कहा, “अमेरिका और चीन के बीच चल रही खींचतान को लेकर हम एक ऐसी स्थिति में हैं, जिसे गोल्डीलॉक्स वाली स्थिति कहा जाता है। न तो रिश्ते में बहुत ज्यादा तनाव हो, न ही बहुत ज्यादा दोस्ती। संतुलन होना चाहिए।”
डॉ. जयशंकर ने सवाल उठाया कि इन हालात में उभरती और मध्यम ताकतों का क्या होगा। उन्होंने कहा, “आज ज्यादातर देश हर मोर्चे पर अपने हितों को सुरक्षित करने में लगे हैं, सिर्फ अर्थव्यवस्था या सुरक्षा ही नहीं, बल्कि सप्लाई चेन को भी ज्यादा मजबूत बना रहे हैं। कई तरह से वे नए गठजोड़ बना रहे हैं और साझा मुद्दों पर मिलकर काम कर रहे हैं और उभरती व मध्यम शक्तियों के लिए जो सबसे जरूरी सिद्धांत एक-दूसरे के साथ तालमेल बैठाना है और शायद वे पहले से ही ऐसा कर भी रहे हैं।”
विदेश मंत्री जयशंकर ने कहा कि आज के दौर में सभी देशों की सोच एक जैसी हो या हित पूरी तरह मिलते हों, ऐसी उम्मीद करना ज्यादा हो जाता है। अगर कुछ मुद्दों पर सहमति बनती है तो साथ काम करने के लिए उतना ही काफी है।
उन्होंने कहा कि जोखिम घटाने और विकल्प तलाशने की इसी कोशिश से धीरे-धीरे एक नई विश्व व्यवस्था बन रही है।
उन्होंने कहा, “अब सवाल ये है कि कौन किसके साथ हाथ मिलाता है। अगर उभरती और मध्यम ताकतों के बीच सीधा टकराव न हो तो वे आपस में सहयोग बढ़ाना चाहेंगी। साथ ही, यह भी स्वाभाविक है कि वे अमेरिका के साथ और चीन के साथ भी मिलकर काम करेंगी।”
उन्होंने कहा कि तीसरा रास्ता अब अपवाद नहीं, आम रिवाज बनने जा रहा है। अब तक जो देश पहले या दूसरे खेमे में सुरक्षित महसूस करते थे, वे भी अब तीसरे विकल्प पर ज्यादा गंभीरता से विचार करेंगे।
विदेश मंत्री के मुताबिक, तीसरे रास्ते का मतलब दूसरों से कट जाना भी हो सकता है, लेकिन आज की आपस में जुड़ी दुनिया में यह संभव नहीं है, इसलिए असली चुनौती है- जुड़े भी रहना और साथ ही अपने हित साधते हुए विकल्प भी खुले रखना। आने वाले वक्त में बहु-संरेखण की सोच और मजबूत होगी, जहां देशों को उन ताकतों से भी रिश्ता रखना पड़ेगा जिनसे तालमेल बिठाना आसान नहीं, लेकिन हकीकत में उनसे दूरी बनाना मुमकिन नहीं।
उन्होंने कहा कि यह एक तरह से बचाव के साथ आगे बढ़ने की रणनीति है। अब देखना यह होगा कि इसका बहुपक्षवाद पर क्या असर पड़ता है, जबकि संयुक्त राष्ट्र जैसा मुख्य बहुपक्षीय मंच पहले से ही गतिरोध का सामना कर रहा है।
