नैनीताल, 10 अक्टूबर (आईएएनएस)। उत्तराखंड के प्रसिद्ध कैंचीधाम में बढ़ती वाहनों की आवाजाही, ध्वनि प्रदूषण और पर्यावरणीय बदलावों के बीच बर्ड वाचर और वन विभाग के अधिकारी क्षेत्र की पक्षी विविधता को लेकर चिंता जाहिर कर रहे हैं। कभी पक्षियों के कलरव से गूंजने वाली कैंचीधाम और पांगरा की पहाड़ियों में अब कई पक्षी प्रजातियों की मौजूदगी कम होने की बात सामने आ रही है।
बर्ड वाचर जगजीवन सिंह धामी ने समाचार एजेंसी आईएएनएस से कहा कि जब किसी भी जगह पर टूरिज्म बढ़ता है तो वहां के स्थानीय लोगों के अलावा वन्यजीव प्रभावित होते हैं। उन्होंने दावा किया कि घरों के आसपास आसानी से दिखाई देने वाली गौरैया अब कैंचीधाम क्षेत्र में लगभग गायब हो चुकी है और कई पक्षी दूसरी जगहों की ओर पलायन कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि कैंचीधाम और पंगोट की पहाड़ियां आपस में जुड़ी हुई हैं। यह पूरा क्षेत्र लंबे समय से पक्षी विविधता के लिए महत्वपूर्ण माना जाता रहा है। ब्रिटिश काल में भी यहां बर्ड वाचिंग की गतिविधियां होती थीं। क्षेत्र में गौरैया, लाफिंग थ्रश समेत कई पक्षी प्रजातियां और विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधे पाए जाते थे। जलस्रोतों के आसपास भी बड़ी संख्या में पक्षियों की मौजूदगी देखने को मिलती थी।
जगजीवन सिंह का कहना है कि करीब तीन वर्ष पहले तक लोग बाबा नीब करौरी महाराज के दर्शन के साथ यहां की प्राकृतिक सुंदरता और पक्षी जीवन का आनंद लेने भी पहुंचते थे। लेकिन समय के साथ पर्यटन का दबाव बढ़ा है। वाहनों की आवाजाही और मानवीय गतिविधियों में वृद्धि से पक्षियों के प्राकृतिक आवास पर असर पड़ने की चिंता है।
जगजीवन सिंह धामी के अनुसार, नैना देवी बर्ड कंजर्वेशन रिजर्व वर्ष 2016 में अस्तित्व में आया था। करीब 114 वर्ग किलोमीटर में फैला यह क्षेत्र लगभग 1,000 से 2,611 मीटर की ऊंचाई वाले भूभाग को समेटे हुए है। इसकी जैव विविधता को देखते हुए कैंचीधाम और आसपास के क्षेत्रों में पक्षियों के संरक्षण पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। उन्होंने सुझाव दिया कि क्षेत्र का विस्तृत सर्वेक्षण कराया जाए। इसमें दर्ज किया जाए कि पहले यहां कौन-कौन सी पक्षी प्रजातियां और पेड़-पौधे मौजूद थे और वर्तमान में उनकी स्थिति क्या है। इस अध्ययन के आधार पर उन प्रजातियों की पहचान की जा सकती है, जिनकी संख्या घट रही है, ताकि उनके संरक्षण के लिए प्रभावी योजना तैयार हो सके।
नैनीताल के वन क्षेत्राधिकारी आनंद लाल ने आईएएनएस को बताया कि कैंचीधाम में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। इसके साथ ही पहाड़ के अन्य क्षेत्रों को जोड़ने वाला हाईवे भी इसी मार्ग से गुजरता है। ऐसे में सड़क पर वाहनों का दबाव काफी बढ़ जाता है, जिससे प्रदूषण और पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर चिंता है। उन्होंने कहा कि कैंचीधाम का इलाका नैना देवी बर्ड कंजर्वेशन रिजर्व से सटा हुआ है और यहां की वन संपदा पहले काफी समृद्ध रही है। उनके अनुसार, कैंचीधाम से पांगरा तक का क्षेत्र पहले बर्ड वाचिंग के लिहाज से महत्वपूर्ण था, और यहां चिड़िया की लगभग 3000 प्रजातियां पाई जाती थी, लेकिन अब पक्षियों की मौजूदगी में कमी महसूस की जा रही है।
वन क्षेत्राधिकारी ने ध्वनि प्रदूषण को भी एक गंभीर चुनौती बताया। उनके मुताबिक, वाहनों के लगातार शोर से पक्षियों के प्रजनन और घोंसले बनाने के अनुकूल वातावरण पर असर पड़ सकता है। उन्होंने यह भी चिंता जताई कि हाईवे के आसपास कुछ पेड़ों की पत्तियों के रंग में बदलाव दिखाई दे रहा है। बढ़ते पर्यटन के बीच वन्यजीवों और पक्षियों के संरक्षण के लिए पर्यटन व्यवस्था में बदलाव की जरूरत भी सामने आई है। वन क्षेत्राधिकारी आनंद लाल ने सुझाव दिया कि कैंचीधाम में इलेक्ट्रिक और प्रदूषण रहित वाहनों के संचालन को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, ताकि वाहनों से होने वाले प्रदूषण को कम करने में मदद मिल सके।
