विदिशा, 19 अक्टूबर (आईएएनएस)। जहां देशभर में दशहरा उत्सव का समापन पारंपरिक रूप से रावण के पुतले जलाने के साथ होता है, वहीं मध्य प्रदेश के विदिशा जिले का एक गांव इस त्योहार को अलग तरीके से मनाता है। यहां लंका के राजा रावण की पूजा की जाती है, जिन्हें प्यार से रावण बाबा कहा जाता है।
रावण मंदिर के पुजारी पंडित नरेश तिवारी ने आईएएनएस से बातचीत के दौरान बताया कि ग्रामीणों का मानना है कि रावण बाबा समुदाय की रक्षा करते हैं और हर शुभ अवसर की शुरुआत उनके आशीर्वाद से होनी चाहिए।
विदिशा की नटेरन तहसील में स्थित रावण गांव में एक प्राचीन मंदिर है, जिसके बारे में स्थानीय लोगों का मानना है कि यह परमार काल का है। मंदिर में लेटी हुई मुद्रा में रावण की 12 फुट ऊंची मूर्ति है, जहां प्रतिदिन पूजा-अर्चना की जाती है। दशहरा पर उनकी प्रतिमा जलाने के बजाय, ग्रामीण रामायण पाठ, भक्ति गीत और एक भव्य सामुदायिक भोज का आयोजन करते हैं, जिसमें विदिशा, भोपाल और आसपास के क्षेत्रों से श्रद्धालु आते हैं।
पुजारी नरेश तिवारी ने कहा, “हमारे रावण गांव में रावण महाराज की प्रतिमा स्थापित है। रावण बाबा महाराज यहां विराजमान हैं और हमारा पूरा गांव उनकी सुरक्षा में रहता है। हमारे सभी कार्य उन्हीं के द्वारा पूर्ण होते हैं।”
पुजारी ने बताया कि ग्रामीण विवाह, विवाह-पूर्व अनुष्ठानों, भागवत कीर्तनों और रामायण पाठ से पहले देवता का आशीर्वाद लेते हैं। उनके मुताबिक, किसी भी शुभ कार्य को शुरू करने से पहले देवता का आशीर्वाद न लेना बाधा उत्पन्न करता है।
यह परंपरा विवाह और नए वाहन खरीदने जैसे महत्वपूर्ण व्यक्तिगत अवसरों पर भी लागू होती है। ग्रामीण रावण बाबा को पहला विवाह निमंत्रण देते हैं और समारोहों को आगे बढ़ाने से पहले उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
ग्राम प्रधान के प्रतिनिधि राजेश धाकड़ ने बताया कि स्थानीय लोककथाओं के अनुसार रावण की मूर्ति यहां मौजूद है। यह कहानी एक शक्तिशाली राक्षस के बारे में है जो रावण को चुनौती देना चाहता था। किंवदंती के अनुसार, रावण बाबा यहां आए और राक्षस के अहंकार को चकनाचूर कर दिया, इसीलिए रावण की मूर्ति विश्राम मुद्रा में दिखाई गई है।
धाकड़ ने कहा, “गांव के नामकरण की कहानी पीढ़ियों से चली आ रही है। कोई निश्चित तिथि नहीं है, लेकिन ‘रावण’ एक प्राचीन नाम है। रावण बाबा की मूर्ति यहां होने के कारण गांव को उनके नाम से जाना जाता है।”
उन्होंने आगे बताया कि वार्षिक दशहरा भंडारा गांव के लिए विशेष महत्व रखता है, यहां तक कि जो ग्रामीण दूसरे स्थानों पर चले गए हैं, वे भी इस अवसर पर यहां अवश्य आते हैं। बहुत से लोग अपनी मनोकामनाएं लेकर यहां आते हैं, और अतीत में उनकी मनोकामनाएं पूरी हुई हैं। इसलिए, वे चाहे जहां कहीं भी हों, दशहरा के दिन वे निश्चित रूप से यहां आते हैं।
स्थानीय निवासी पंडित गोविंद नारायण तिवारी ने बताया कि गांव में रावण की पूजा देवता के रूप में की जाती है और धार्मिक एवं पारिवारिक समारोहों में उसे सर्वोच्च स्थान दिया जाता है। हम रावण महाराज की पूजा देवता के रूप में करते हैं, और बाकी सभी लोग भी ऐसा ही करते हैं, क्योंकि रावण महाराज वास्तव में भगवान हैं। यहां हर शुभ अवसर पर रावण बाबा की पूजा सर्वप्रथम की जाती है।
उन्होंने आगे बताया कि विवाह समारोह भी रावण बाबा को अर्पण से शुरू होते हैं, जिसमें तेल का पहला अर्पण भी शामिल है, अन्य समारोहों से पहले।
गांव की यह विशिष्ट दशहरा परंपरा एक स्थानीय धार्मिक प्रथा को दर्शाती है, जिसमें रावण, जिसे आमतौर पर रामायण में खलनायक के रूप में चित्रित किया जाता है और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक माना जाता है, को रक्षक और ग्राम देवता के रूप में पूजा जाता है।
