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यमुना के झाग हटाने के टेंडर पर विवाद, वित्तीय बोली खुलने से पहले ही ठेकेदार के पहुंचने का ‘आप’ ने लगाया आरोप

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नई दिल्ली, 21 अक्टूबर (आईएएनएस)। दिल्ली में यमुना नदी को प्रदूषण मुक्त करने और कालिंदी कुंज के पास नदी की सतह पर जमा झाग हटाने के लिए किए जा रहे प्रयासों के बीच दिल्ली जल बोर्ड (डीजेबी) की टेंडर प्रक्रिया पर सवाल खड़े हो गए हैं। आम आदमी पार्टी के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज ने आरोप लगाया है कि यमुना के झाग हटाने से संबंधित टेंडर की वित्तीय बोली अभी तक नहीं खोली गई है, लेकिन ठेकेदार कंपनी आइकॉन इंस्ट्रूमेंट्स पहले ही मौके पर टेंट और उपकरणों के साथ पहुंच गई है।

इस घटनाक्रम को लेकर सौरभ भारद्वाज ने दिल्ली जल बोर्ड की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए संभावित अनियमितताओं की जांच की मांग की है। सौरभ भारद्वाज ने सोशल मीडिया एक पोस्ट साझा कर आरोप लगाया कि जब टेंडर की वित्तीय बोली ही नहीं खोली गई है तो संबंधित कंपनी को काम मिलने से पहले ही साइट पर तैयारियां करने की अनुमति कैसे मिल गई। उन्होंने इस स्थिति को ठेकेदार का पहले से चयन किए जाने का संकेत बताते हुए दिल्ली जल बोर्ड की निविदा प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठाए हैं।

उन्होंने इस मामले को दिल्ली के लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) में सड़क निर्माण से संबंधित कथित भ्रष्टाचार के आरोपों से भी जोड़ा है। उनका कहना है कि पहले सड़क निर्माण के कार्यों में कथित अनियमितताओं को उजागर किया गया था और अब दिल्ली जल बोर्ड के कामकाज पर सवाल उठ रहे हैं।

भारद्वाज ने दावा किया कि पीडब्ल्यूडी और दिल्ली जल बोर्ड, दोनों विभाग मंत्री प्रवेश वर्मा के अधीन हैं। उन्होंने मंत्री से सवाल किया कि क्या वह इन मामलों में संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करेंगे या भ्रष्टाचार उजागर करने वालों को ही निशाना बनाया जाएगा। उन्होंने भ्रष्टाचार के मुद्दे उठाने वाले लोगों के मोबाइल फोन छीनने की कोशिश किए जाने को लेकर भी तंज कसा।

उनका सवाल है कि सरकार भ्रष्टाचार के आरोपों की निष्पक्ष जांच कराएगी या शिकायतकर्ताओं के साथ टकराव का रास्ता अपनाएगी। कालिंदी कुंज के पास यमुना में सफेद झाग की समस्या लंबे समय से चिंता का विषय रही है। नदी में प्रदूषण कम करने और झाग हटाने के लिए किए जाने वाले उपायों पर सरकारी धन खर्च होता है। यदि वित्तीय बोली खोले जाने से पहले ही किसी कंपनी को काम सौंपने या उसके पक्ष में निर्णय लेने के आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह गंभीर प्रशासनिक सवाल खड़े कर सकता है।